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नानी

nani

रवि यादव

और अधिकरवि यादव

    जीवन के सबसे कमतर समय में

    सबसे अधिक जीने की इच्छा सुगबुगाती रहती है भीतर

    सालों पहले देखे गए दीवार के रंग कुछ फीके हो चुके होते हैं

    या रंगों का उतार चढ़ा देता है उन पर कोई अन्य रंग

    आँखों के नीचे की झुर्रियाँ गिन रही होती हैं उम्र

    वह स्त्री अब कुछ चुप-चुप रहती है

    खिलखिला उठती है किसी को देख

    उसकी मुस्कान

    और छलछला उठती हैं उसकी आँखें

    अब कोई इच्छा नहीं रहती

    सिवाय बहुत-सी इच्छाओं के

    जिनको पूरा करते-करते अपूर्ण-सा रह जाता है

    कुछ-कुछ जीवन

    मैं उससे कहता तुम्हारे गोदने बहुत सुंदर हैं!

    और वह अपना हाथ फैला दिखा देती

    पति के नाम के गोदने की जगह

    अपने ही घर एक उम्र के बाद अकेले लगने लगते हैं!

    घर के साँकल की तरह बजता रहता है हृदय अचानक से

    हम सबको अकेला छोड़ के जाते हैं

    अकेले आते-आते धीरे से वह

    पकड़ा देती हाथों में

    अपने अँचरा के कोने से निकाल

    कुछ रुपए

    स्रोत :
    • रचनाकार : रवि यादव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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