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नई शिक्षा-पद्धति

nai shiksha paddhati

सृष्टि वत्स

सृष्टि वत्स

नई शिक्षा-पद्धति

सृष्टि वत्स

और अधिकसृष्टि वत्स

    कुछ पुरुष

    केवल इसलिए माफ़ कर दिए जाते हैं

    क्योंकि वे पिता या भाई या

    बाप-दादाओं की ही कोई संतान हैं

    और हम अपनी ही माँओं की चिता पर

    रोज़ अपनी-अपनी चुप्पियों के सफ़ेद फूल चढ़ाते हैं

    मेरी नानी गूँगी थी

    यही गूँगापन उसने अपनी बेटी को दिया

    पीढ़ियों की परंपरा की तरह माँ

    मुझे दान करती अपना गूँगापन

    इससे पहले ही मैंने उसे दिया बहरापन

    उसने ख़ुद चुना अंधापन

    जो गूँगे होते हैं

    वे निश्चित ही बहरे भी होते हैं

    गूँगे, बहरे और अंधेपन से दुःख कम नहीं होते

    वे गहरे रोग में बदल जाते हैं

    यह रोग संक्रमण का है

    और अब पैंतालीस की अवस्था में

    मैं तुम्हारी परवरिश करूँगी

    तुम्हें मेरी उम्र में लौटना होगा

    मैं तुम्हें सिखाऊँगी नसबंदी करने का हुनर

    ताकि तुम काट सको पितृसत्ता की नसें

    यह मेरी दया नहीं है तुम पर

    मेरे ऊपर मेरा ही उपकार है

    मैं तुम्हारी दोनों आँखों में

    सैकड़ों सूरजमुखी के बीज बोना चाहती हूँ

    ताकि एक घना जंगल उग आए

    और तुम तन कर खड़ी रह सको

    किसी भी तीव्र रोशनी की आँखों में देखते हुए

    लाल रंग से अब तुम्हें ऊब जाना चाहिए

    तुम यह जानो कि मोगरे का भी एक रंग है

    तुम्हें चुनना चाहिए सफ़ेद

    ताकि हर युद्ध की आशंका के पहले क्षण ही

    तुम उससे लिपट कर चिरनिद्रा में सो जाओ

    स्रोत :
    • रचनाकार : सृष्टि वत्स
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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