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नई राह

nai raah

अमित उपमन्यु

और अधिकअमित उपमन्यु

    कभी हवा से भी हल्का लगता है प्रेम

    रंग बन सवार होता है तितली पर

    चुन लिया जाता है गुलाब से शहद की तरह

    बनता है बाग के फूलों में

    और इत्र-सा महकता है साँसों में हम दोनों की।

    कभी समंदर से भी भारी होता है

    तले में बैठता चला जाता है

    सूरज सा जलता है फ़लक पर

    धरती को भी जलाता है

    रेत सा खटकता है आँखों में हम दोनों की।

    ऐसे ही इक भारी दिन

    व्यथित हो मैं अपना थैला उठाता हूँ

    और तुमसे दूर चला जाता हूँ।

    जीवन में शांति खोजता मैं एक पेड़ के नीचे पहुँचता हूँ

    एक सेव मुझ पर गिरता है और मुझे न्यूटन याद आता है—

    वक़्त के साथ जोड़ और मज़बूत ना हो

    तो प्रेम शाख से टूट जाता है।

    जीवन में संतुलन खोजता मैं समंदर किनारे पहुँचता हूँ

    वहाँ आर्किमिडीज़ को बैठा पाता हूँ

    वह मुझे अपनी खोज सुनाता है—

    जब प्रेम के ऊपर लगाया जाने वाला बल

    उसके नीचे की सतह से भारी हो जाता है

    प्रेम अतल गहराई में हमेशा के लिए खो जाता है।

    जीवन में आदर्श खोजता मैं आगे बढ़ता हूँ

    रास्ते किनारे बॉयल, चार्ल्स और गे-लुसाक

    अपनी-अपनी खोज सुना रहे हैं

    और आदर्श गैस की ख़ूबियाँ बता रहे हैं

    मैं चाव से सुनता जाता हूँ

    अंत में वे सामूहिक घोषणा करते हैं—

    ‘असली ज़िंदगी में कोई भी गैस आदर्श नहीं होती‍‌‘

    मैं भौंचक्का रह जाता हूँ!

    पीछे के जंगल से डार्विन की आवाज़ गूँजती है—

    ‘बदलो! या नष्ट हो जाओ!’

    मैं गहरी सोच में पड़ जाता हूँ...

    पुराना थैला बाहर ही छोड़

    मैं नई राह से घर लौट आता हूँ।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अमित उपमन्यु
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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