नै चाही विस्तार
nai chahi vistar
आब कहाँ रहलै ओ समय
जहनि कि दाइ माँ सरोबर लिखै छली
ओइमे दहाइत पुरइनिक दह आ असंख्य फुलायल कमलक फूल
आँकै छली बँसबिट्टी आ ओइ पर मरराइत सूगाक जेर
नै आब कहाँ रहलै ओ समय
जहनि रुपैयाक मोन भरि अनाज भेटै छलै
चालीस सेर दूध भेटै छलै
नै आब कहाँ रहलै ओ समय
आब त' ओ सबटा बुढ़बा ककाक मूँहक
कुबैन-अनसोहाँत खिस्सा टा रहि गेल छै
खाली आँतक
पताइत कंठक सोहर आखरिस कते नीक लगतै
फाटल आँचर आखरिस कते अनुराग लपेटिक' राखि सकतै
डिहबार आकि पीड़ बबाक मनौती
भगत ककाक झाड़-फूक आ
मोलबी साहेबक गंडा-ताबीज पर
पथाएल पिपनी पर
कत्ते ममत्व पथराइत रहतै
नै, नै चाही आर अधिक विस्तार
महाकालक अजेगरी जीहक लेल निमूधन आहार
नै, नै चढ़ौतै आर बेसी
गामक कोनियाँ अनुरागक
ठकुआ-भुसबाक अरग
दिन-दिन अकाबोन सन
भेल जा रहल महानगरक फूट-पाथ
ओ गामक पठरू आ टूनाक हेर
चहाएल-छगाएल तकने फिरैए
नुकेबाक ठेकान
अभावक ऐ अकाबोनमे
नै, नै चाही विस्तार
गनलो-गूथल निस्सन बीया
खेतक हरियरीक लेल बहुतो होइ छै
नै होइ छै उपजा
घुनाएल ढाकी भरि बीहनि स'
उसरि जाइ छै वंश
लक्ष संख्य रावणक
आ
शतसंख्य कौरबोक
आ बसि जाइ छै कोनो भारत
वनकन्या शकुन्तलाक
एक्केटा बेटा भरतो स'
एक्केटा मनु स' बसल छै इ दुनिया
भस्मसात भ' जाइ छै सगरक सहस्त्रो संतान
आ एकमात्र भागिरथो जमीन पर
गंगा उतारै छै, एक्केटा बुद्ध झुका दै छै
अंगुलीमालक
दुर्दान्त दस्यु बल के
आ एक्केटा सुरुज चिर्रीचोंत क' दै छै
महान्धकार
नै, नै चाही आर
अनावश्यक विस्तार।
- पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 41)
- रचनाकार : राज
- प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
- संस्करण : 2011
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