मैं सोचती हूँ यह देश मेरा नहीं होता
नहीं जन्मी होती अगर मैं यहाँ
तो क्या सुबह-ए-बनारस देख पाती
क्या मुनासिब होता मुझे शाम-ए-अवध
कहाँ से लाती भोपाल की वो गलियाँ
जहाँ बीत गया बचपन आँखमिचौली खेलते
उन तीर्थों को कैसे पाती
कहते हैं जिसकी धूली ही माथे से
चिंता की सब लकीरें मिटा देती हैं
कैसे जानती कि
यहाँ नदियों के नाम
अधिकतर नारीत्व का आभास लिए क्यों हैं
कैसे समझती कि इस देश में स्त्री होकर आना ही
यहाँ नदी हो कर आना है,
हाँ, शायद अब समझ आ रहा है कुछ-कुछ,
क्यों नहीं टिकते मेरे पैर एक ठिकाने पर
नदियाँ भला रुकी है कहीं?
अजीब बात है
मुझे शहर की तलाश है
जबकि इतिहास कहता है
सभ्यताओं को नदियों की तलाश होती है
पनपती हैं ये वहीं।
मुझे रोको मत, जाने दो
क्या जाने किस सभ्यता को तलाश हो मेरी?
मैं सिर्फ़ बेटी नहीं
अपने वतन की नदी भी हूँ
जहाँ भी जाती हूँ
वहीं पनप जाती है एक नई सभ्यता।
- रचनाकार : ऐश्वर्या तिवारी
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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