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नाक पर

naak par

पूनम शुक्ला

और अधिकपूनम शुक्ला

    इन दिनों पड़ती है जैसे ही नज़र

    किसी के चेहरे पर

    झट से आँख टिक जाती है नाक पर

    नाक क्या छोटा-सा टापू कह सकते हैं इसे

    जो सागर से चेहरे पर बनाए हुए है सबसे ऊँचा स्थान

    दो आँखें इसमें तैरती हुई दो नाव की माफ़िक

    ज्यों टिकी हो इस टापू के अंतिम छोर पर

    चेहरे पर तरह-तरह की भंगिमाएँ सागर की ऊँची-नीची लहरों-सी

    मैं देखती हूँ संपूर्ण दृष्य पर आँख है कि टिक जाती है नाक पर

    हर चेहरे पर है बिल्कुल अलग तरह की नाक

    कोई इतनी छोटी कि भ्रम हो कि है भी या नहीं

    कोई ऐसी कि आकाश भेदने को तैयार

    कोई ऊपर से पतली नीचे से चौड़ी

    कोई ऊपर से नीचे तेज़ी से भागती हुई

    कोई नीचे से बिल्कुल गोल ऊपर को उठी हुई

    कोई नुकीली त्रिभुजाकार

    कोई थोड़ी टेढ़ी तोते की चोंच सरीख़ी

    जितनी नाक उतनी आकृति

    जितनी नाक उतने भेद

    प्रकृति की अद्भुत संरचना

    जिसने जाना बस श्वास का आना जाना

    जिसने जाना बस इस जीवन की लय

    देह में दौड़ते लहु का स्पंदन

    ऊष्मा स्नेह...

    पर हमने रख दिया इसी पर

    मान सम्मान अपमान...।

    स्रोत :
    • रचनाकार : पूनम शुक्ला
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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