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जो सकति क्यार अउतारु होयि,

स्यावा का साँचु सरूपु होयि;

जिहि का घर मा परगासु होयि,

हाँ, असिलि म्यहरिया वहयि आयि।

अउ नीक म्यहरिया वहयि आयि।

जो संत्वाख की प्यटरिया हयि,

दुलहा के दुख-सुख मा साथी।

लरिका-बिटियन का कलपु बिरिछु ,

जिहि के बरक्कती हाथ होयि,

बसि ठीक म्यहरुआ वहयि आयि।

जो तीनि तिल्वाक घूमि आवयि,

मुलु तहूँ म्यहरिययि बनी रहयि।

जिहि की मरजाद अयिस पक्की,

जो सपन्यउ मा तनिकि बिगरयि

बसि, साँचि म्यहरुआ वहयि आयि।

जिहि की कोखी ते जगु जलमा,

जो सिरिहिटि की महतारी हयि।

वह पुरुख रूप की पुन्नि अयिसि,

जब जगर-मगर जग मा जागयि

तब साँचु म्यहरिया वहयि आयि।

जो जलयि जिययि बिटिया, बहिनी,

महतारी, भउजी के ओहदा—

भरि-भरि पवित्रता पूरि करयि;

जब सुघरि सुलच्छनि नारि होयि।

हाँ नीकि म्यहरुआ वहयि आयि।

जो माता कहे ते महकि उठयि

महतारी वाले ब्वालन पर।

जो बिटिया, बहिनी नाउँ सुने ते

हँसि तन मन ते ल्वहँकि जायि

बसि, नीकि म्यहरुआ वहयि आयि।

जो मनई का मनई मानयिं,

मुलु खुदउ म्यहरुवयि बनी रहयि।

जो वहिका बोरी, अपनउ बूड़ी,

लोकु पताल चला जायी;

तब नीकि म्यहरुआ कहाँ आयि?

बिटिया महतारी, मनई छोंड़े,

अलग - अलग मीटिंग करि हयिं।

क्यतना भगमच्छरु मचि जायी,

कसि छीछाल्यादरि होति रही।

ना नीकि म्यहरुआ असि आयि।

मनई म्यहरी ते सुखी होयि,

मुलु, होयि म्यहरुवउ मनई ते।

यह खइँचा तानी कहाँ नीकि,

जो छायि रही पिरथी ऊपर।

का नीकि म्यहरिया यहयि आयि?

स्वाचउ स्वाचउ, द्याखउ द्याखउ,

बिटिया महतारिउ दुनिया की।

लरिका तुम ते अकुतायि उठे,

बुढ़ऊ बरम्हा जी खुद पूँछयिं—

“का, रूपु म्यहरिया अयिसि आयि?”

स्रोत :
  • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 132)
  • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
  • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
  • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
  • संस्करण : 1998

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