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मुक्तिबोध की "कहने दो उन्हें जो कहते हैं" पढ़ते हुए

muktibodh ki "kahne do unhen jo kahte hain" paDhte hue

संतोष सिंह

संतोष सिंह

मुक्तिबोध की "कहने दो उन्हें जो कहते हैं" पढ़ते हुए

संतोष सिंह

और अधिकसंतोष सिंह

    कहने वाले बहुत कह गए गजानन

    वो तो सदियों से कहते आए हैं

    पूनम की चाँदनी में नहाकर

    उसने अपनी जीत की कहानी कही थी

    तब मैं अपनी हँसी दबा के बैठा था

    उसकी अवहेलना का साहस कहाँ था मुझे

    राजा के आसन अक्सर

    मातहत की पीठ होती है

    पर पीठ कहाँ दिखाई देती है

    पीठासीन ही दिखाई देते हैं

    मेरे आँसुओं को उबालकर

    ही उसने बनाया था समरस

    और धरती के तमाम

    देवताओं को पिलाया था।

    आश्वस्त रहो, मुक्तिबोध

    इस बार हम घुग्घू और सियार बनेंगे

    बनेंगे भूत और पिशाच

    हम निरा मानव बनकर सरपट

    दौड़ेंगे उस बरगद की तरफ़

    उस पर अपनी जगह लेंगे

    फिर हमारी जो झूलती जड़ें

    धरती को उम्मीद से फिर भर देंगी

    सारी क्रांति के निशाने पर रहते हैं

    सदा से अभिजन

    बास्तील के किले के ढहने से

    रोमानोव एम्पायर के पतन तक

    या फिर भारत की आज़ादी तक

    क्रांति के केंद्र में हम आमजन ही थे

    अब हमारी सफलता का जश्न होगा

    एक ही पूनो की चाँदनी होगी

    कहने दो उन्हें जो कहते हैं

    उनके कहने से क्या होता है

    वो जो कहते थे कल की बात थी

    मैं आज और आने वाले कल की बात हूँ

    मैं एक निरा आम आदमी हूँ

    जो कंदराओं से निकलकर

    किले को ध्वस्त करता है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : संतोष सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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