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मृत्यु

mrityu

सुमन शेखर

सुमन शेखर

मृत्यु

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    दिन-ब-दिन ख़र्च होती ज़िंदगी

    बढ़ती जाती है मृत्यु के दरवाज़े की तरफ़

    सांसों के गुबार के पूरे ख़त्म होने तक

    मृत्यु बैठी रहती है इंतज़ार में

    कि उसकी बारी आए

    और एक झटके में ख़त्म कर दे सारी लीला

    उबले ख़ून-सी बहती नदी

    उफ़ाने मार कर लाँघ रही है भीतर नसों को

    गर्म, बहुत गर्म

    इतनी गर्म

    कि ज़ोर गर्माइश पर

    मौत तक पहुँचने के पहले ही

    खींच जाती है गाड़ी की चेन

    और ज़िंदगी की गिनती

    सदियों के मौत में रेंगते ओझल हो जाती है

    मैं भी सांसों के एक-एक बुलबुले को

    छोड़ना-पकड़ना चाहता हूँ अपना हक़ जानकर

    मेरी मौत स्वभाविक होते-होते

    कब अस्वभाविक मौत की तरफ़ मुड़ जाएगी

    मुझे नहीं मालूम

    जिस तरह जाते-जाते हुए

    कोई आँखों से ओझल हो जाता है

    मैं वैसे नहीं जाऊँगा

    मेरा जाना इतना अस्वभाविक होगा

    जैसे हवा का भरा ग़ुब्बारा था

    सो फूट गया

    और इतनी बड़ी-सी दुनियाँ में

    गिनती के जो कुछ मेरे होंगे

    चुनकर फेंक आएँगे मेरे जीवन के टुकड़े।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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