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मृत्यु

mrityu

अनुवाद : सुरेश सलिल

पारिजात

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मृत्यु

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    बहुत दिन पहले, जब पखेरू नंगी डालों पर बैठे ऊँघ रहे थे

    मैं अपनी ही खोखली ज़िंदगी पर घुटती हुई बैठी थी :

    विनाश और ऊलजुलूलियत के आरोपों के साथ

    मृत्यु को कोसती हुई मैं एक कविता रचना चाहती थी।

    किंतु तब मृत्यु को मैं महाभारत के पृष्ठों के ज़रिए

    महज़ शब्दों के रूप में जानती थी।

    यद्यपि, एक मौक़े पर, अपने दुःख से मुक्ति पाने की कोशिश के दौरान

    मृत्यु ने तक़रीबन मेरे चेहरे को ढक लिया।

    अब मृत्यु का वास्तविक साक्ष्य मेरे पास है;

    वह एक सँकरे पहाड़ी पुल पर मेरे हाथ आया;

    जब एक माँ ने नमक के लिए

    फलियों की अदला-बदली करने के इरादे से

    उसे पार किया।

    भूख की बेहाली से वह लड़खड़ाई

    और उसकी पीठ पर टिका पालना फ़िसल गया

    और उसका बच्चा चीख़ें मारता हुआ

    काली की प्रलुब्ध लहरों में जा समाया।

    यह थी मृत्यु।

    रात के सन्नाटे में अपनी चमचमाती कार दौड़ाते

    लक़दक़ सफ़ेद सूट से लैस, नशे में धुत्

    शहर के एक अधिकारी ने

    चीथड़ों लगे एक गाड़ीवान को

    सड़क किनारे कुचल दिया।

    यह थी मृत्यु।

    फिर वे सामूहिक मौतें।

    भूखों की;

    मुक्ति के लिए जूझते देशभक्तों की;

    अपनी ज़मीनों के लिए माँग उठाते किसानों की।

    अब मैंने मृत्यु के बारे में अपनी धारणा बदल ली है।

    वह जीवन से विच्छिन्न होना नहीं है

    ही उसका अंत।

    लाल फ़रहरे में लिपटे शहीदों के साथ

    वह हमारे बीच चहलक़दमी करती है।

    उसे मृत्यु की बजाए बलिदान कहो;

    ये मौतें हममें प्रेरणा भरती हैं।

    अन्यायपूर्वक मारे गए वे लोग

    हमारे मानस में हमसे मुख़ातिब होते हैं

    और उनकी हत्याओं का बदला लेने के लिए

    हमारा ग़ुस्सा उमड़ने लग पड़ता है।

    नहीं, मृत्यु का अंत नहीं होता;

    वह एक बंधु-भाव में ढल जाती है

    और हम उसका आलिंगन करते हैं।

    वह एक आवाज़ बन जाती है

    और दीवार पर शब्द चमक उठते हैं

    वह एक आह्वान बन जाती है।

    नहीं, मृत्यु कभी नष्ट नहीं होती;

    किसान भूखों मरे और भूमिहीनों ने अपने को ख़ाक किया

    ताकि एक लंबी क़तार बन सकें हाथ में हाथ दिए,

    मुट्ठियाँ कसे, क़दमताल करते हुए।

    मृत्यु एक प्रतिज्ञा बन जाती है

    एक संकल्प

    एक वचनबद्धता

    दुश्मन के सीने पर तनी एक संगीन।

    मृत्यु एक हथियार में ढल जाती है

    प्रहार बन जाती है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 444)
    • रचनाकार : पारिजात
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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