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शीतल छाया

shital chhaya

छत्रानन्द सिंह झा

और अधिकछत्रानन्द सिंह झा

    जाहि घनगर वृक्षक छायामे

    श्रांत-क्लान्त अहाँ

    सुस्ताइत छी,

    छाया अहाँकेँ अप्पन

    खास अप्पन लगैत अछि,

    मुदा मीत!

    छाया अहाँक नहि थिक।

    बहुतो दिनसँ बाट-बटोही—

    नाना भेष, बोली-चाली

    एहिना अबैत रहल,

    सुस्ताइत रहल।

    वृक्ष अपन छाया एहिना बिलहैत रहल—

    निष्पक्ष, निर्विकार।

    लोकक श्रम-स्वेद बिन्दुकेँ

    अपन शीतल छायासँ सुखबैत रहल

    सुख बँटैत रहल।

    लोक आयल, लोक गेल

    मुदा वृक्ष ककरो पाछु नहि धयलक।

    ठामक ठामहि रहल।

    तैँ मीत!

    अहूँ जी भरि सुस्ता लियऽ

    भावनाक मोटरी खोलि

    मोनकेँ हल्लुक कऽ लिय‍ऽ

    अपनत्वक भ्रम भने मनमे पोसि लियऽ

    मुदा मीत!

    मानि लियऽ

    गीरह बान्हि लियऽ

    छाया अहाँक नहि थिक।

    क्षणिक सुखसँ उपजल मोह

    सत्य नहि थिक।

    सत्य थिक छाया—

    शाश्वत, चिरंतन, अजेय।

    स्रोत :
    • पुस्तक : एक गुलाबक लेल (पृष्ठ 51)
    • रचनाकार : छत्रानन्द सिंह झा
    • प्रकाशन : नीलकण्ठ प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 1988

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