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मीठा ज़हर

mitha zahr

गरिमा सिंह

गरिमा सिंह

मीठा ज़हर

गरिमा सिंह

और अधिकगरिमा सिंह

    अच्छा होता है—

    सब कुछ का स्वाभाविक गति में होना,

    स्थिरता गतिशीलता की विरोधी है,

    समय का स्वभाव है—चलना!

    लेकिन

    समय कहीं रुक जाए,

    कैद हो जाए—एक कोठरी में,

    तब सब कुछ स्वाभाविक गति से,

    नहीं चलता…

    नहीं चलता एक मनुष्य का जीवन!

    महान दार्शनिक रूसो ने कहा था—

    ‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,

    वह स्वतंत्र पैदा हुआ है,

    लेकिन सर्वत्र बंधनों में जकड़ा हुआ है’

    बंधन मृत्यु है…

    क्या होगा;

    गर समय बाँध लिया जाए…?

    ‘प्रेम’

    अपने में पूर्ण और स्वतंत्र,

    अत्यधिक गतिशील,

    विरोधाभासों का समुच्चय,

    स्वाभाविक गति से—

    तीव्रतर गतिवालों को मुक्त करता है…

    ‘समय’

    अत्यधिक तीव्रगामी,

    परिवर्तन का कारण,

    लेकिन

    रूका हुआ समय—

    बंधन का कारण

    बनता जाता है…

    ‘प्रेम’

    जब ‘समय’ को—

    नियंत्रित करता है;

    तब कोई सृजन नहीं होता!

    बल्कि ‘वह’ सर्जना के विनाश का

    कारण बनता है…

    ‘प्रेम’ में

    एक ‘व्यक्ति’ के भीतर,

    संपूर्ण दुनिया को देखा जाना—

    दुनिया को हीनतर मानना है!

    क्या यह स्वाभाविक है?

    ‘प्रेम’

    जितना व्यापक और गहरा होगा,

    दुनिया उतनी ही अस्वाभाविक होगी,

    हमें लगेगा कि हम मुक्त हो रहे हैं

    लेकिन असल में

    हम पूरी दुनिया से दूर और अकेले होंगें!

    ‘प्रेम’

    तब सर्वाधिक पोषित होगा—

    जब ‘प्रेमी’ की प्रतिभा क्षरित होगी…

    ‘वह’ धीरे-धीरे—

    ‘उसे’ दुनिया से काटेगा…

    और ‘उसके’ हृदय में—

    भावनाओं का ज्वार होगा…

    जीवन की ज़रूरी परीक्षाओं में—

    जीतने वाला मनुष्य,

    जब ‘प्रेम’ में हारने लगेगा…

    तब ‘समय’ कैद में—

    अकुलाएगा…

    यह अकुलाहट—

    विध्वंसक होगी;

    ‘प्रेमी’ धीरे-धीरे—

    पीड़ा और उदासी

    गहराई से महसूस करेगा…

    वह उठना चाहेगा,

    लेकिन ‘प्रेम’ के आगे

    हारता जाएगा,

    और एक दिन

    विनष्ट हो जाएगा!

    ‘प्रेम’ में

    हारी हुई मैं—

    महसूस कर रही हूँ

    कि मेरी प्रतिभा—

    क्षरित हो चुकी है…

    मैं मात्र एक मिट्टी का लोंदा हूँ,

    जो दु:ख और उदासी से

    परिपक्व होती गई…

    मैं समय के बहुत पीछे छूट चुकी हूँ,

    और मेरा समय एक तहख़ाने में कैद है…

    बाहर का समय गतिशील है,

    और भीतर का समय स्थिर,

    जीवन का द्वंद्व—

    हर पल महसूस करती हूँ,

    मैं निकलना चाहती हूँ बाहर…

    लेकिन

    देखो सुकरात!

    ‘प्रेम’ ने मुझे—

    ‘मीठा ज़हर’ दे दिया

    स्रोत :
    • रचनाकार : गरिमा सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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