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मेरे पिता और मैं

mere pita aur main

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

व्येकोस्लाव मायैर

व्येकोस्लाव मायैर

मेरे पिता और मैं

व्येकोस्लाव मायैर

और अधिकव्येकोस्लाव मायैर

    जब मेरे पिता और मैं जंगल में

    टहलने जाते हैं,

    हमारे आसपास सब उदात्त और शांत होता है

    कि मानो उसी क्षण बज उठेगा अरगन

    पत्तियों में कहीं छिपा हुआ।

    मेरे पिता, कुछ झुके हुए, कंकड़ों पर खड़े हो जाते हैं

    और सुनते हैं : चिड़ियाँ गाती हैं;

    गाती हैं कहीं ऊँची शाख के छोर पर

    बड़ी शांति में,

    जहाँ तितली नाचती है ऊपर नीचे

    नीलाई में।

    तो लगता है मुझे कि मैं और मेरे पिता, हम एक हैं,

    कि मानो अदृश्य नलियाँ

    रक्त उँडेलती हैं उनके शरीर से मेरे में,

    कि मानो सुन रहा होऊँ कलकल हमारे रक्त की

    हरियाली के बीच जहाँ मच्छर भिनभिनाते हैं।

    और कैसा भारीपन लगता है मुझे यह जानकर :

    कि उनका हर चरण

    उन्हें अंधकार के निकटतर लिए जाता है,

    जब कि हर चरण मेरा

    मुझे जीवन के निकटतर लिए जाता है

    तब अपराध से भरा-सा उनसे मुँह फेर लेता हूँ,

    यों जंगल में अकेले टहलते हम,

    एक ऊपर की ओर, दूसरा नीचे की ओर।

    दो अच्छे साथियों-से ज्यों अलग होते

    कंकरीली राह पर टहलते रहे

    और हमारे आसपास सब उदात्त और शांत है

    कि मानो उसी क्षण बज उठेगा अरगन

    पत्तियों में कहीं छिपा हुआ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 57)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : व्येकोस्लाव मायैर
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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