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मेरा स्नेह

mera sneh

एम. पी. अप्पन

अन्य

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मेरा स्नेह

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    मेरा स्नेह वह मधु नहीं है,

    जिसे अपनी प्रिया को ही देता रहूँ।

    वह अपरिसीम है,

    जैसे अमल प्रभा का प्रसरण।

    अमृत-तरंग की तरह वह

    सारे विश्व का आलिंगन करता है।

    शीतल मृदुल सून दलों की भाँति

    वह आँसू बहाती हुई

    विधवा की आँखों को

    झुकी गुलाम की करुण रीढ़ पर

    विवश कृषक के

    पसीने से भीगे कपोलों पर

    कठिन यत्न करने वाले

    मज़दूर के ललाट पर

    सानुकम्प रोज़ सहलाता है।

    मेरा निष्पाप स्वतंत्र स्नेह

    अनाड़ी ग्राम-हरिजन के दिल की

    कविता बन जाना चाहता है।

    जलती मरुभूमि को

    हरा-भरा बनाने वाली

    नदी बन जाना चाहता है।

    दुःख पीड़ित भाइयों की बेड़ी

    काटने वाली तेज़ तलवार बनना चाहता है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : गौरी शंकर (पृष्ठ 28)
    • रचनाकार : एम. पी. अप्पन
    • प्रकाशन : केरल हिंदी साहित्य परिषद
    • संस्करण : 1981

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