बासी रोटियाँ

basi rotiyan

उपासना झा

उपासना झा

बासी रोटियाँ

उपासना झा

और अधिकउपासना झा

    सबको गर्म खाना खिलाते हुए

    अक्सर माँ के हिस्से आती रहीं बची हुई रोटियाँ

    अन्न का अपमान नहीं करना चाहिए

    ये कहकर उसने भूख भर खाने की तमीज़ सिखाई

    थाली में जूठन छोड़ने से पृथिवी को दुःख होता है

    भूखे पेट सोने से चिड़िया भर मांस कम हो जाता है देह से

    उसमें अबोध मन में डाली यह बात कि अपने शरीर का ध्यान रखना कर्त्तव्य है

    उससे दूर रहते हुए भी अलग-अलग शहरों के हॉस्टलों में

    भूख और रोटियों ने मुझे जोड़े रखा उससे सबसे ज़्यादा

    कुछ अच्छा खाकर उसकी याद कम आई

    लेकिन भूखे रहकर उसकी याद बहुत आई

    बीमार होने पर उसकी याद बहुत-बहुत आई

    त्यौहारों पर उसके बनाए पकवानों की सुगंध आँखों से बह गई

    समय के चाक ने रोटियाँ बनाना भी सिखा दिया

    बस ये पता ही नहीं चला कि कब

    रोटियों का बासीपन माँ की थाली से उतरकर

    मेरी थाली में चला आया

    स्रोत :
    • रचनाकार : उपासना झा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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