मैक्सिको शहर के जीव-जंतु
meksiko shahr ke jeev jantu
अजीब तरह के जीव हैं ये
पैदा हुए सड़न में
कायाकल्प हुई पिघलते प्लास्टिक की ताप के पास।
उबलते हैं सीमेंट में,
कीलों के बिच्छू,
बेकार रुई के स्तनपायी जीव जिनकी चमड़ी पर
पढ़े जा सकते हैं जगमगाते फोड़े-फुंसियाँ।
चोर बाज़ार के कूड़े से संतृप्त थूथनें
मैकेनिक की दुकानों का शहद चूसती हैं।
उनकी महक तारपीन-सी, उनका पसीना ग्लिसरीन।
आसमान की इमारत में,
बिजली की पंछी, परमाणु पंखों के पर लिए,
तितलियाँ प्रदर्शित करतीं ब्रांडों के लोगो,
जापानी बंदर।
मछलियाँ पसरी हुई टंकियों में
इतवार के भोज के बाद।
जीव जो हमारे अंदर बसते हैं
तेज़ी से भोजन करते हैं
चाटते जाते हैं जो कुछ बाक़ी है हममें
गुप्त नालियों में, और फ़ुटपाथों पर :
मल-मूत्र और बाल, हज़ारों नाख़ून कटे हुए
उखाड़ी गईं कोशिकाएँ, बलगम के ढेर
जीते हैं हम असंभव में संभव को,
गंतव्य उस जगह का स्वयंभू है जो
वह महान शहर
किसी आकार लेती फ़ोटो-जैसा।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 291)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
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