बलबान मानवक हाथक बलसँ
बैसल छह तों सराइपर
बनि गेल अछि पूज्य
पाबैत छह धूप-दीप-नैवेद
कबुलापाती सेहो होइत छह
लोक अछि आन्हर परबुद्धी
जानैत अछि स्थानक टा सम्मान
नहि तँ, जकर बलें रूचिगर
बनैत छै, भोज्य पदार्थ
तै लोढ़ी सिलौटकेँ ओंघड़ाय
मन्दिरमे पड़ल निरर्थक
पाषाण पिंडकेँ क्यों की करैत प्रणाम
तञ हे माटिक महादेव! नहि करह कनेको अहंकार
जखनहि हेंतह विसर्जन
लगतह सभ बोकिआबय
हँ, अक्षत चानन फूल
पूज्य पदक किछु चेन्ह
जाधरि रहतह लागल
लत-खुर्दनिसँ रहि सकैत छह बाँचल
किन्तु निष्पक्ष परीक्षक
कालक प्रहारसँ पाबि न सकबह त्राण
झड़ि धोखरि जेतह सब चेन्ह।
तखन की हेबह? से करह कने अनुमान
पदेँ प्रतिष्ठितकेर होइत अछि
की अन्तिम परिणाम
से जनैत छह
केवल पद-सत्कार
- पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 56)
- संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
- रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
- प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
- संस्करण : 1989
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.