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मानवीय प्रदूषण

manaviy prdushan

सूर्य प्रकाश शर्मा

सूर्य प्रकाश शर्मा

मानवीय प्रदूषण

सूर्य प्रकाश शर्मा

और अधिकसूर्य प्रकाश शर्मा

    आँखों को वह अब नोंच रहा।

    मानव! अब भी क्या सोच रहा?

    तेरे ही हठ का कारण यह।

    है ख़तरनाक उच्चारण यह॥

    वह कल युग का खर दूषण है।

    मानव! वह 'महा प्रदूषण' है।

    क्यों काट दिए तूने जंगल?

    तू फ़तेह कर रहा है मंगल।

    पर पृथ्वी को तू जला रहा।

    सपनों की नगरी सजा रहा।

    ग़र नहीं रहेगा आगे तू।

    फिर सजा रहा है नगरी क्यूँ?

    हर जगह प्रदूषण छाया है।

    ये मानव की ही माया है।

    पहले क्यूँ ना संकोच किया?

    अब आँखों को तेरी नोंच लिया।

    अब श्वाँस मिल रही जहरीली।

    जीवन की सड़कें पथरीली।

    कहते हैं 'जल ही जीवन है'।

    जल से जीवन में उपवन है।

    पर जल भी आज प्रदूषित है।

    ये ज़हर हर जगह भूषित है।

    मानव पेड़ों को काट था।

    वह ज़हर हर जगह बाँट रहा।

    फ़िर कहते हैं 'मानव महान'।

    जय मानव और जय विज्ञान।

    पर दोनों प्रकृति के दुश्मन।

    अब झुलस रहा जीवन उपवन।

    अब इसका कोई उपाए कहो।

    जिससे प्रकृति दूषित ना हो।

    यही मानव लाए सुव्यवहार।

    कर सकता सबका उद्धार।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सूर्य प्रकाश शर्मा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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