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मैं गृहस्थन-गृहविहीन

main grihasthan grihavihin

पूनम शुक्ला

पूनम शुक्ला

मैं गृहस्थन-गृहविहीन

पूनम शुक्ला

और अधिकपूनम शुक्ला

    मैं एक औरत हूँ

    मैं मकान को घर बनाती हूँ

    जब दीवारें रंगी जाती हैं घर की

    सब पूछते हैं मुझसे

    कौन-सा रंग चलन में है इन दिनों

    किस रंग में फबेगा यह कमरा

    मैं कमरे का आकार देखकर

    पर्दों व विभिन्न वस्तुओं को

    अपनी कल्पना में उतारकर

    एक-एक रखी हुई

    वस्तुओं की गुपचुप बातें

    धीरे-धीरे सुनकर

    बताती हूँ, ये रंग...

    घर में रखे हर सामान में

    समाई हुई है मेरी गंध

    और उनकी मुझमें...

    चली जाऊँ कहीं भी

    याद आने लगता है घर

    लगती हूँ खरीदने

    घर के लिए चादरें

    कभी कलाकृतियाँ

    कभी कुछ बरतन

    पर लगता है कभी-कभी

    ज्यों अजनबी हूँ इस घर में

    पूछा तो गया था

    इन निर्जीव दीवारों की ख़ातिर

    रंगों का नाम मुझसे

    पर मेरे अपने रंग के बारे में

    नहीं पूछा किसी ने

    मेरे सपनों में भी उभरते हैं कुछ रंग

    बनती बिगड़ती हैं विभिन्न आकृतियाँ

    चाहती हूँ बताना पर तब भी है अनसुना

    एक बार चाहा था बताना

    भीतर से बटोरी थी हिम्मत

    डरते काँपते थोड़ा सहमते

    पर तुमने खींचकर मेरा हाथ

    धकेल दिया था मुझे घर से बाहर

    और कहा था कि यह घर है तुम्हारा

    मुझे ढूँढ़ना होगा यहाँ

    अपना रंग तुम्हारे रंगों में

    खोजने होंगे स्वप्न तुम्हारे सपनों में

    जब से साथ हो गया तुम्हारा

    माँ ने कहा था

    अब पराई हो गई तू बिटिया

    नहीं है यह घर तुम्हारा

    और कहते हो यहाँ तुम यह घर है तुम्हारा

    मैं गृहस्थन

    घर बनाने वाली

    एक स्त्री

    गृहविहीन हो गई हूँ।

    स्रोत :
    • रचनाकार : पूनम शुक्ला
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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