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मैं भटकता हूँ

main bhatakta hoon

नंद लाल 'क़ैदी'

नंद लाल 'क़ैदी'

मैं भटकता हूँ

नंद लाल 'क़ैदी'

और अधिकनंद लाल 'क़ैदी'

    मैं भटकता हूँ, भटकने दो—

    जहाँ जिस व्योम में

    जाकर अटकता हूँ

    अटकने दो।

    बड़े हमदर्द भावों के

    बड़े रक्षक विचारों के

    जहाँ मैं सर पटकता हूँ

    पटकने दो।

    समय रहते मसीहा

    खोज ख़ुद लेगा

    लटकता हूँ जहाँ

    जिस शाख़ से जाकर

    लटकने दो।

    करो जो भी तुम्हें करना

    कहो जो कुछ तुम्हें कहना

    खटकता है अगर कोई

    खटकने दो।

    ये माना है बहुत

    नाराज़ मौसम भी

    जमाना तैश में है और

    बहुत तेवर में सरकारें

    अकड़ता है अगर कोई

    अकड़ने दो।

    स्रोत :
    • पुस्तक : तार वीणा के सजा दो (पृष्ठ 17)
    • संपादक : मोहन सिंह
    • रचनाकार : नंद लाल 'क़ैदी'

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