मैं अपनी संवेदना में बच्चा बनता जा रहा हूँ
main apni sanvedna mein bachcha banta ja raha hoon
ऋषभ पाण्डेय
Rishabh Pandey
मैं अपनी संवेदना में बच्चा बनता जा रहा हूँ
main apni sanvedna mein bachcha banta ja raha hoon
Rishabh Pandey
ऋषभ पाण्डेय
और अधिकऋषभ पाण्डेय
एक रोज़ जब मैं थोड़ा समझदार हुआ
तो सहसा स्नायुओं में एक सनसनाता हुआ बोध उत्पन्न हुआ था कि
नानी केवल हमारे लिए नानी नहीं थी
वह मेरी माँ की माँ भी थी
जब मैं सात साल का बच्चा था
एक दिन सुबह आँख मींचते हुए उठा और देखा कि
माँ दबी दबी-सी आवाज़ में सिसके जा रही थी
इसके पहले माँ को जब भी रोते देखा
वे सभी रुदन इस घटना के सामने रुदन बौने लगे
नानी अब इस दुनिया में नहीं थी
माँ पतली-सी झिल्ली में
अपने कपड़े चपोरती हुई सिसकती जा रही थी
कभी-कभी सोचता हूँ
माँ को जानने से पहले
उनके मष्तिष्क में जहाँ-तहाँ ठहर गए
सुबह के उस रूदन को समझना कितना ज़रूरी था
ससुराल में रहते हुए नई बहुओं के लिए मायके पर
आँसू ख़र्च करना कितना मुश्किल होता है।
इसके पहले माँ नानी के लिए कब कब रोई
मुझे नहीं पता
लेकिन नानी को याद करते हुए
मैं उनका वह उदात्त
रुदन हमेशा महसूस करता हूँ।
- रचनाकार : ऋषभ पाण्डेय
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.