जानि ने के रोपि क' मरि गेल
ई माहुरक गाछ
जे प्रकृति पर्यावरणक कएने जा रहल अछि विषाक्त
चौबीसो घंटा गछारने रहैत अछि
एहि गाछकेँ मोटका-मोटका अजगर साँप
गहुमन-करेत सभ एहि गाछपर जमौने रहैत अछि
अपन अड्डा
आ छोड़ैत रहैत अछि फुफकार
एहि गाछक फल खा क' नीक-नीक आदमी
बनि जाइत अछि नरपिशाच
किनसाइत एहि गाछक रोपबइया एकरा पटौने छल
घृणा-विद्वेषक पानिसँ
आ जड़िमे देने छल उन्मादक खादि
यैह कारण अछि जे आब ई गाछ
आक्सीजनक बदलामे छोड़ैत अछि
जाइ लाल ब्रोमाइड
विध्वंसक फूल आ फसादक फल बला ई गाछ
सुड्डाह करय चाहैत अछि वर्तमान सभ्यता
एकरा कनिको नहि पसिन छैक मनुक्खता
एहि गाछक नजदीक अएला मात्रसँ
लोक बन जाइत अछि बताह
फेर ओकरा नहि रहैत छैक
गाम-समाज आ देश-दुनियाँक परबाहि
ओ एहि गाछ तर बैसि बनबय लगैत अछि
विध्वंसक हथियार
ओ एहि गाछ तर बैसि लगबय लगैत अछि
फसादक जोगाड़
मुदा एकरा मतिभ्रम कही आकि दृष्टि-दोष
एहि माहुरक गाछकेँ मोक्षक द्वार
बुझैत अछि बहुसंख्यक लोक
आ एहि अंधविश्वासमे माहुरक गाछक रक्षा लेल
मानव बम बनबाक लेल भ' जाइत अछि तैयार
गिरा दैत अछि हजारक हजार निर्दोषक लहास
जखन कि क्षमा-दया, सत्य-अहिंसाक रास्ते—
आसानीसँ पहुँचल जा सकैत अछि ईश्वरक दरबार
प्रेम-सिनेह, शांति-सौहार्द्र-सद्भावनासँ खोलि सकैत अछि
अपन मोक्षक द्वार
मुदा ई सभ कियैक मानत हमर गप
जखन कि माहुरक गाछ रोपय बला हिनकर सभक
छनि अपन आदर्श!
- पुस्तक : प्रतिकार एखन बाँकी अछि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 32)
- रचनाकार : रामकृष्ण परार्थी
- प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
- संस्करण : 2022
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