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महुआ

mahua

मोहनलाल यादव

और अधिकमोहनलाल यादव

    महुआ के महिमा बा बहुतै अगम अपार सजनी।

    महुआ कूँच से तरई टपकै, मह मह मह महुआरी महकै

    साँझ सबेरे चिरई चहकैं, गुलजार सजनी।

    महुआ कुदरत के उपहार, महुआ मधुरस के भंडार,

    दुखी गरीबन के आहार, सिरजनहार सजनी।

    चूवै भदर भदर खुब महुआ, बिनते सासु ननद अउ बहुआ

    भरिके भउका डलिया झउआ, महकै द्वार सजनी

    महुआ अहै गरीब के मेवा, दूध में चुरवा करौ कलेवा

    जी भर खाइ के मोछा टेवा, लेहुँ डकार सजनी।

    महुआ के रसवा लेव गार, लपसी बने जायकेदार

    मिलि के खाओ कुल परिवार, लज्जतदार सजनी।

    बनवा पुआ, गुलगुला, लाटा, जीभर खाइके ओठवा चाटा

    रान पड़ोसिउ के खुब बाँटा, बड़ बेवहार सजनी।

    महुआ के समझौ बादाम, बिकता बहुतै सस्ते दाम

    खाओ सुबह-दोपहर-साम, चमकै चाम सजनी।

    सुन्नर कोवा के तरकारी, उत्तम स्वाद और बलकारी

    नाहीं आवे पास बीमारी, अति गुणकारी सजनी।

    महुआ तेल औषधी माना, नरम मुलायम पूड़ी छाना

    साबुन बनइ तेल से जाना, हो बेवपार सजनी।

    महुआ से जे बनवै दारू, ओकर भागि जाइ मेहरारू

    जूता, चप्पल, बेलना, झाडू, पड़े कपार सजनी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : अलगौझी (पृष्ठ 64)
    • रचनाकार : मोहनलाल यादव
    • प्रकाशन : हंस प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2023

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