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मदारी के घुमा दियौ

madari ke ghuma diyau

राज

राज

मदारी के घुमा दियौ

राज

और अधिकराज

    बुढ़बा मदारी हमरा बंसुरीक धुन

    सुना मोह' चाहै-ए

    की ओकरा पता नै छै कि आब हम

    सुनबासँ पहिने देखै छियै?

    खाहे कतबो पियास किए ने लागय

    मुदा हमर आँखि मिझेबा स' पहिने धरि

    निहारैत रहत, चिन्हैत रहत कि

    हमरा लेल पानि कोनो झरनाक नै

    कोनो अजेगरक जीह स' चुबैत लेर भ' सकै छै

    हमरा बेर-बेर आपस क' अनबाक

    ओकर मादक सुर पुरना गेलै-ए

    हमरा सभक बीच जे मुखौटा के

    लगा पहुँचै छल

    आब ओकरा चेहरा पर कुबैन बैसै छै

    अपसोच! क़ियो ओकरा बुझा सकिते

    कि लक्ष्मण, मारीच रामक स्वर

    अंतरक नीमन नहैत चीन्ह गेल छै

    तैयो मदारी डमरू बंसुरी बजा हमरा शोर पारै-ए

    की ओकर उमेद एखनौ धरि नै ठेहिएलै-ए

    कि ओकर चौतरफा गोठियैल भीड़मे हम

    साझी नै भ' सकै छी!

    हमरा पता ऐछ कि भीड़ भखरि रहल छै

    भखरि जेतै

    कियै त' मदारी खाली

    रूप-महल ठाढ़ करबाक

    बात टा कहि रहल छै

    खोपरीक नै

    भीड़सँ जहनि-जहनि 'रोटी-रोटी'

    अवाज अबै छै त'

    डमरू बंसुरीक अवाज के

    तेज क' दै छै

    आबह मीत!

    हम सभ डमरू बंसुरीक

    धुन ओकरा घुमा दियै

    रोटीक टोहमे सहयात्रा करी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 48)
    • रचनाकार : राज
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
    • संस्करण : 2011

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