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माँ का गणित

maan ka ganit

विशाल कुमार

विशाल कुमार

माँ का गणित

विशाल कुमार

और अधिकविशाल कुमार

    दो काँटा ऊपर,

    दो काँटा नीचे,

    अम्मा कुछ जाल-सा रचे।

    मैं सोचूँ, कौन-सा यह खेल,

    अद्भुत उँगलियों-काँटों का मेल।

    जोड़, घटाव—ये कौन-सा फेर,

    सुबह बैठे तो उठे गदबेर।

    कभी छाने, कभी दे भागा,

    मैं तो सुना माई जन्म से

    अनपढ़, गंवार और अभागा।

    ना सीखी अँग्रेज़ी, विज्ञान और गणित,

    जाने क्यों सीख रखे इतने गीत।

    तीज-त्योहार, मुंडन या विवाह,

    स्वर कोकिल-सा गाए धाराप्रवाह।

    माई सच अनपढ़ या अफ़वाह?

    बिना किसी रेखागणित के ज्ञान के

    बना लेती गोइठे बिल्कुल गोलाकार।

    फिर उसे जब जोड़कर

    लगाती है चूल्हे में आँच,

    देख मैं समझ नहीं पाता—

    माई मेरी अनपढ़-गंवार,

    है झूठ या सच?

    बिना पढ़े किताबें

    अपने गाँव-आँगन का सारा इतिहास जानती।

    रखती वह गाँव-जवार से नाता,

    करुणा इतनी कि सबको अपना मानती।

    लेती सबकी सुध,

    समझती सबकी आह।

    माई सच अनपढ़ या अफ़वाह?

    स्रोत :
    • रचनाकार : विशाल कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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