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लोकतंत्र बा लूटीं भाई

loktantr ba lutin bhai

कृष्णानन्द कृष्ण

कृष्णानन्द कृष्ण

लोकतंत्र बा लूटीं भाई

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    लोकतंत्र बा लूटीं भाई, जतना सँपरे

    सरकारी बा माल समझ के आपन खाई

    जे बाँचे से लूट-पाट के घर ले जाई

    साम-दाम से जय-जयकार कराई सगरे।

    गली-गली रउवा प्रताप के झंडा फहरे

    ना माने जे, लाठी से लोहा मनवाई

    केकरा में दम बा अतना, जे सोझा आई

    नाँव लेत राउर, लोगिन पर बज्जर घहरे।

    सत्ता में आवे के पहिले मालिक रहले

    लाल कार्ड के। साफ भुलइले राजा अइसन

    सबसे टहल-टिकोरा आपन खूब करवले

    लोगिन के बूझेले, पवनी-परजा जइसन

    मेला उडसल, मुँह लटकवले निज घर गइले

    सब लोगिन के कर देलन अइसन-तइसन।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आपन गाँव भेंटाते नइखे (पृष्ठ 18)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2012

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