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लौट जाओ विकास-पुरुष

laut jao vikas purush

सुशील कुमार

सुशील कुमार

लौट जाओ विकास-पुरुष

सुशील कुमार

और अधिकसुशील कुमार

    जब तुम विकास की बात करते हो

    तो नदियों का जल काँपने लगता है

    पेड़ और पंछी उदास हो जाते हैं

    पहाड़ मौन हो जाता है

    किसान के दिल में हूक समा जाती है

    दिन सूना

    रातें भयानक

    बेघरों के यातना-शिविरों की दु:स्मृतियाँ जाग उठती हैं

    —फिर लय में कोई प्रलय!

    —फिर नीरवता में कोई झँझावात!!

    नहीं, नहीं...लौट जाओ विकास-पुरुष

    नहीं चाहिए हमें ऐसा वैश्विक गाँव

    हम फिर से अपनी आदिमता में लौट आना चाहते हैं

    जिसमें घने जंगल हों

    पंछियों की तेज चहचहाहटें हों

    बच्चों के खेलने की जगह और किलकारियाँ हों

    पशुओं के रंभाने की आवाज़ें हो

    हर खेत से हरियाली हँसती हो

    हर नदी के जल में रवानगी हो

    पहाड़ ओस से पूरा तर-बतर धुंध में लिपटा हो

    और सूरज पूरे शौर्य से

    किसी बड़े लाल फल की तरह

    हमारे झोपड़े के पीछे से

    आकाश में ताजातरीन हो उठा हो।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुशील कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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