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लड़कियाँ नहीं होती हैं लकड़ियाँ

laDkiyan nahin hoti hain lakDiyan

अनामिका अनुगूँज

अनामिका अनुगूँज

लड़कियाँ नहीं होती हैं लकड़ियाँ

अनामिका अनुगूँज

और अधिकअनामिका अनुगूँज

    और ना ही उससे बनी कठपुतलियाँ,

    कि उनकी डोर बाँध दो किसी और की उंगलियों में।

    लड़कियों की उँगलियों में भी होते हैं पोरुए,

    जिन पर गिन सकती हैं

    वे अपने सपनों को

    एक सपना,

    दूसरा सपना,

    तीसरा सपना

    अहा

    अनंत सपनों की लड़ियाँ हैं उनके हाथों में,

    कैसे खुरच सकते हो उनके हाथों को?

    इंद्रधनुष-सी रंगीन

    उनके सपनों की चमक को

    तुम कैसे बदल सकते हो आँसुओं में।

    उनके मनों में पल रहे सपनों को

    कैसे मार सकते हो तुम?

    अगर सच में तुम ऐसा करते हो

    अगर सच में तुम ऐसा कर सकते हो

    तो हाय्य

    कितने मर चुके हो तुम...

    स्रोत :
    • रचनाकार : अनामिका अनुगूँज
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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