अब जब खेती-बाड़ी ही है चलन में,
पीट की दलदलों से बुलबुलाती हैं कविताएँ,
लोग बुड्ढों की मारक बलग़म से कर रहे हैं संघर्ष,
जो खाँस कर बिखेरी है उन्होंने उत्तर और उत्तर-पूर्व में
कुछ ज़िंदा बोलियों के टुकड़ों के मध्य,
समय आ गया है कि रचे अपने बिखराव का गीत,
तुम्हारा घर एक प्राचीन गीत का स्रोत;
आग में चरचराते सूखे नारियल के खोल,
धुआँ भरते हमारे बच्चों की आँखों और फेफड़ों में,
कच्चे केलों से रिसता तेल एक मिट्टी के पात्र में,
गले से उतरती गाढ़ी मीठी काली चाय।
बछड़े दूध पीने को व्याकुल,
रस्सी से बँधे चीख़ते-चिल्लाते मार खाते,
जब तक गाय दूह नहीं ली जाती।
नटखट बच्चे खाने की गुहार लगाते।
बेवक़ूफ़ रूपराम बाँध के पीछे अपने बाप की बकरी चराने जाता
इस स्वप्न में डूबा कि जो दातुन की लकड़ी वह मनोयोग से चबा रहा
है,
वह लकड़ी नहीं है।
इंग्लैंड की एक मनहूस ठंड में,
हम अपनी स्मृतियाँ समेट कर उसका ढेर लगा रहे हैं,
अपने मालिकों के वैभव से।
तुम सदैव दूर अपने घरों में थे, हमेशा
जैसे गन्ने के खेत और चाबुक की मार…नहीं बदलते
जैसे पुराने डच मैदान के क़ब्र के पत्थर
जिसे बच्चे गेंद खेलते हुए विकेट बनाते थे।
यहीं हरिलाल बाज़ार की रेहड़ी के काम से भाग कर आता,
और रामादीन की तरह स्पिन गेंद फेंकता
और फिर तुम्हारी धुनाई का शौर्य से सामना करता
जैसे इंग्लैंड हार रहा हो
अब लोग उसे अपना देसी पाकिस्तानी बुलाते हैं
वह अब बलहम की एक धीमी दुकान चलाता है।
क्या उसका दिल धंधे में नहीं लगता
बल्कि बरसों से लगता है विकेट के गिरने में
लफंगे लड़कों के शोर में?
या वह बहुत वक़्त ज़ाया करता है,
गाहकों से गपियाने, साहेब-बंदगी करने में
उन चुस्त कपड़ों में जैसे गिरती बर्फ़ का पीछा करते पेंशनधारियों से
मौसमी मुस्कान देता, हँस कर बतियाता, उधार देता?
वे भी हरिलाल की तरह, इस साम्राज्य के गूँगे पंजे,
इस दाँत दिखाती सेवा से स्वयं को विशेष समझते,
उसकी आवाज़ में तासे की धुन,
और समुद्र का मुक्त स्वर।
उसकी दाँतों से दमकती सूर्य की आभा।
ढेर है तुम्हारे बग़ल में बूढ़ा डाबिदीन
जो अल्बियोन के खेतों में अलस्सुबह
नहर के किनारे किसी हठधर्म से नहा कर,
उस साँपों से भरी जल-धारा में पुष्प अर्पित कर,
चंद्रा का पकाया भोजन ईश्वर को परोस,
अपनी क्रियोल ज़बान को धोता,
वह दलित पीड़ित कुली बड़बड़ाता।
उसके हिंदी-मंत्र मेढकों को डराते,
जो उछल कर झाड़ियों में छुप जाते।
वह भगवान कृष्ण का सुमिरन करता कि बचा रहे—
उसके बेटियों का कौमार्य
उन नीग्रो से,
वह प्रार्थना करता कि गोरे मालिक इनाम देंगे
ऋतु के अंत में बोनस देंगे पुनाई को
वह घसियारा, बुलंद, उसका इकलौता बेटा;
चंद्रा का गर्भ देवताओं से शापित
जैसे बंजर ज़मीन
बीहड़ जंगल या काँटे
जिसने आदमी के वर्षों की ताक़त घसीट ली।
चंद्रा किसी गूँगी-बहरी की तरह घर में टहलती
उसके आदेश पर,
एक डरी हुई दुल्हन, जिसकी उमर भी है कम
साल दर साल बच्चियों से पेट फुलाती।
अपराध-बोध से खिंचा हुआ मुँह,
उसके क्रंदन की इच्छा का गला घोंटता;
जब एक दाई के चीथड़े में हड़बड़ा कर लपेट कर,
बोझ उतार कर पटक दिया जाता एक माँ की गोद में।
वह पैर पटकता, गरियाता, उसे पीटता रहा उम्र भर
पेड़ काट कर, गाय पाल कर, बाड़ बाँध कर मेहनत से
अपनी बेटियों के दहेज-ख़र्च निकालता।
भारत का स्वप्न देखते
वह पीता शराब
जब तक वह मर नहीं गया
और स्कॉटिश प्रेस बाइटेरियन गीतों के साथ दफ़ना दिया गया
एक बड़ी आँखों वाले बड़बड़ाते पादरी के नरक-अग्नि उपदेश के साथ,
पुनाई के द्वारा, जिसका आधे गाँव की तरह बाद में बपतिस्मा हो
गया।
ढलती उम्र की,
डाबिदीन की विधवा,
मुर्ग़ों के दड़बे की ओर लड़खड़ाती जाती,
गंदी गालियाँ देती, जुगाली करती, किसी स्वप्न में खोई
अपनी मुरझाई हथेलियों से चावल छिड़कती।
वह बुढ़िया,
गुज़रती उस क़ब्र से जहाँ डाबिदीन सुस्ता रहा है,
सुस्त रोज़ की धूप की तरह,
वह दाल-भात में अपने हाथ डुबाता,
घिनौना आदमी, किसी बदज़ात की तरह डकारता, गटकता,
चलो, मर गया कुत्ता अब!
लग गया है आकर पहला नाव
किंग जॉर्ज के शहर के दलदली पोत पर। कुली आराम करेंगे
एल डोरेडो में,
उनके चेहरे और सुंदर साड़ियाँ हो गईं राख-सी काली,
आदमियों से गंध आ रही है खारे पानी और शराब की।
यह लंबी यात्रा थी नदी से ज़मीन को जोड़ती एक पटरी,
महज़ कुछ गज़ मगर महीनों की योजना
एक गोरे की नाव के कसे हुए पेट में,
वर्षों के वादे, वर्षों का विस्तार।
सबसे पहले हरी ज़मीन की चमक और गोरे लोग और नीग्रो,
धरती का रंग जैसे टूकन के चोंच-सी धारियाँ,
जैसे एक भाग्यशाली आकाश में उड़ते किस्काडी,
जैसे धूप में पकते गन्ने के खेत,
सोने से भरी बाँहों से समेटे जाने की प्रतीक्षा में।
मैं देर से आया और श्राद्ध का दिन निकल गया,
आप समझेंगे कि संपर्क कठिन होता है।
तीन हवाई जहाज़ और कई अदला-बदली
मशीनों और ज़मीनों की, पुनर्जन्मों की तरह
इस क़ब्रों के संग्रहालय तक लाने में,
इस छोटे से ख़ाली मैदान में।
यहाँ कोई समाधि-पट्टी, समाधि-लेख, तारीख़ अंकित नहीं।
हमारे पूर्वज सिकुड़ कर, सूख कर पपड़ी बन जाते हैं।
वे पड़े होते हैं अक्षरों की तरह,
अपनी संतानों द्वारा लिखे जाने की प्रतीक्षा में
जिनके लिए उन्होंने कटाई की, जुताई की, बचत की,
ताकि दूर विद्यालयों में भेज सकें।
“क्या तुम्हारे दिमाग़ में गोबर भरा है,
मैं मर गया हूँ।
कुत्ते की हड्डियाँ और सूखे कुएँ,
कहानियाँ नहीं कहते,
जैसे मैं बेवक़ूफ़ जन्मा, वैसे ही मर गया।”
फिर भी हम उन क़ब्रों में
लोक-कथाएँ तलाशते हैं।
हम एल डोरेडो के मानचित्र लूटते हैं
ताकि हम समृद्ध कर सकें उस इंग्लैंड को
जिसे सोने की भूख है।
अल्बियोन गाँव सोते हैं, कटे हुए
झाड़ियों और नदी के भीगे होंठों के बीच।
लोग जो हड्डियों को जानते हैं
सपनों में ख़ुद को मोटा करते हैं
ताकि दिन काट सकें।
मच्छर ख़ून चूस कर गीत गाते हैं।
एक हरी आँखों वाला चाँद देखता है
रस्सियों पर लटके झोपड़ों की गठिया जैसी पीड़ा
आँधियों की बड़ी चोंच से खुरचे जोते,
वे पुराने तूफ़ानों के चोट के निशान।
क्रैपू गला साफ़ करते एक बेसुरे संगीत में
जुगनू ख़ुदकुशी करते आग की लपटों में।
एक हरी रात में बारिश के वादे के साथ
आप मर जाते हैं।
हम तुम्हारी यादों को गीतों में अंकित करते हैं,
लोगों के खोखलेपन का मांस चढ़ा कर,
कविताएँ जो खुरचती हैं कटोरे और हड्डियाँ,
घर से दूर एक अँग्रेज़ी तहख़ाने में,
या स्वीकारते हैं अपनी आसुरी हवस,
दुर्लभ दंभ में
पढ़े-लिखों के किसी मंच पर
वाइन पीते, भोजन के बीच रुक-रुक कर—
देखो गोरे हाथों से फड़फड़ाती वह तालियाँ
उसी मेज़ पर बेतरतीब से पड़े नैपकिनों की तरह।
- पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
- संपादक : अविनाश मिश्र
- रचनाकार : डेविड डाबिदीन
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