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कुछ नहीं है आस-पास

kuch nahin hai aas paas

सुशील कुमार

सुशील कुमार

कुछ नहीं है आस-पास

सुशील कुमार

और अधिकसुशील कुमार

    कुछ नहीं है आस-पास

    कोई नहीं है यहाँ

    कुछ छयाएँ हैं केवल

    दूर तलक पीछा करती हुई

    रोज़ कुछ मिटती कुछ आरी तिरछी होती हुई

    चारों तरफ़ से अदृश्य दीवारों ने घेर रखा है मुझे

    किसी भूतबंगले की काई खाई जीर्ण-शीर्ण

    मकड़ियों के जाले और कीट- पतंगों से भरे हुए

    सोचता हूँ, किन बंधनों में में कैद हूँ

    किन विचारों ने मेरी निजता को खंडित किया है,

    मेरे प्रवाह को रोक रखा है,

    फ़िलवक्त यह तय कर पाना मुश्किल है

    इतना अँधेरा है यहाँ कि

    चीज़ों को हाथ से टटोलने की ज़रूरत आन पड़ी है

    लेकिन हाथ बंधे हैं मज़बूत अदावत और

    कशमकश की उन जंजीरों से

    जिससे मुझे बांधा गया है हिजाब की तरह

    जीवन का दृश्य बहुत वीभत्स यहाँ!

    चलो अब यहाँ से कहीं दूर देस

    जहाँ खुला आकाश हो

    पूरी धरती हो ग्लोब की तरह

    दर्द के लिए थोड़ा आँसू हो

    जहाँ पंख खोलने की इजाजत हो

    जहाँ उड़ान भरने की भरपूर आजादी हो!

    जहाँ कहने आऔर सुनने के लिए

    थोडा वक्त ज़रूर हो!

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुशील कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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