कुछ ऐसे भी दिन होते हैं
जो मुझसे होकर गुज़रते हैं
लेकिन मैं उन्हें पकड़ नहीं पाती
खोई रहती हूँ
रात की ख़ामोश कहानियों में
कभी उनमें प्यार में बीता हुआ
दिन टटोलती हूँ और कभी
चुपचाप अकेले गुज़ारी शाम
जो दिन मुझसे होकर गुज़रते हैं
उनमें बहुत से अल्फ़ाज़
अपनी खनक तोड़ने को बेक़रार बैठे हैं
ज़रा उनका हाथ थामूँ तो
वो बेपनाह मोहब्बत बरसा दें
लेकिन मैं उन ख़ुशियों को
अपनाए बग़ैर गुम-सुम बैठी रहती हूँ
ऐसा लगता है जैसे प्यासी लहरें
मुझे छूना चाहती हों
लेकिन मैं उनके खारेपन से
डर के पीछे हट जाती हूँ
ऐसा क्या है जो मैं ख़ामोश रातों को
अपना हमसफ़र मानती हूँ
और दिन जो बेहद हसीन हैं
उनसे ख़ुद को दरकिनार किए रहती हूँ
दिन जो मुझसे होकर गुज़रते हैं
मैं उन्हें पकड़ नहीं पाती,
खोई रहती हूँ!!
- रचनाकार : रेणु मिश्रा
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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