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कोने की चुप्पी

kone ki chuppi

देवेंद्र 'देव'

देवेंद्र 'देव'

कोने की चुप्पी

देवेंद्र 'देव'

और अधिकदेवेंद्र 'देव'

    जाने

    कितना सच है?

    मैं तो,

    कुछ भी समझ नहीं पाता हूँ

    तुमने जब भी कोशिश की,

    मुझसे जुड़ने की मुझे लगा—

    मैं वहीं कहीं से

    मुड़ जाता हूँ।

    कोने की चुप्पी

    आकाशी छत पर

    टहल रही थी।

    जब,

    जिज्ञासा—

    निर्वस्त्र पेड़ की छाया-सी

    रह-रह कर बदल रही थी।

    सुनो,

    सड़क के दोनों ओर

    खड़ी क्या हर प्राचीर

    विगत में गौरवशाली

    महल रही थी?

    और नहीं तो

    फिर क्यों

    अपनी बुनियादों को छू

    गहरे तक,

    अंदर ही अंदर

    मैं अपने

    कुढ़ जाता हूँ।

    सोचा तो,

    ऐसा था

    अबकी बार मिलोगे

    जब मुझसे तुम

    सचमुच ही मैं,

    बिलकुल

    बदल गया हूँगा

    और दबाना, जी भरके मेरे घावों को

    मैं दुबारा अधरों पर

    वो शब्द नहीं लूँगा।

    किंतु मेरे उन्मुक्त मित्र!

    मैं फिर हारा

    मैं, साथ तुम्हारे दूर-दूर तक चलूँ

    अभी कैसे संभव?

    हाँ,

    छाँह-तुम्हारी लिए

    आज-कल आस-पास तक

    उड़ आता हूँ।

    जाने कितना सच है...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : संधियाँ लेकर (पृष्ठ 56)
    • रचनाकार : देवेंद्र 'देव'
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 1998

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