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कितनी देर है?

kitni der hai?

देवेंद्र 'देव'

देवेंद्र 'देव'

कितनी देर है?

देवेंद्र 'देव'

और अधिकदेवेंद्र 'देव'

    एक,

    गहरी रात

    फिर विस्तार इतना

    चाँद जैसे—

    खो गया हो

    और,

    तारे भी नदारद

    छटपटाकर

    कह रहा है मन

    हमें संदेह है

    अब सुबह होने में

    कितनी देर है?

    मैं—

    तुम्हारे संग

    बदल भी तो नहीं सकता

    सफलता,

    द्वार तक आई और!

    अब तो लौटती-सी है

    विफलता,

    पाँव में

    मेहँदी-सी चिपकी है

    घिसटता हूँ

    मैं—देखो आज

    चल भी तो नहीं सकता।

    सहजता आज

    उत्सुकता लिए ही—

    प्रश्न ख़ुद करती

    ये किसके द्वार-देहरी तक

    घना अंधेर है।

    सत्य को हम,

    खा रहे हैं

    नींद की गोली समझकर

    और, चहकने को समझ बैठे हैं

    हम हुँकार का स्वर—

    किस बुलंदी से

    निरत दोहरा रहे हैं।

    यूँ उमंगें देखकर

    मचली थीं कितनी कलम को

    सच कहें हम आज

    लिखना सीखकर पछता रहे हैं।

    हम किसी

    आक्रोश का

    उपनाम ही हैं दोस्त!

    आह्वान है, विश्वास का—

    उस प्रात का

    रक्तिम अमिट संदेश है।

    अब सुबह होने में कितनी देर है?

    स्रोत :
    • पुस्तक : संधियाँ लेकर (पृष्ठ 17)
    • रचनाकार : देवेंद्र 'देव'
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 1998

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