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कितने कल पर टालोगे

kitne kal par taloge

संदीप द्विवेदी

संदीप द्विवेदी

कितने कल पर टालोगे

संदीप द्विवेदी

और अधिकसंदीप द्विवेदी

    नए बहानों के सिक्कों पर

    कितना समय उछालोगे...

    मंज़िल पाने की कोशिश को

    कितने कल पर टालोगे...

    याद रहे कल पर जितना भी

    आज को हमने टाला है

    एक दिन यही इकठ्ठा होकर

    हम पर छाने वाला है

    घेर खड़ा हो गया तो सोचो

    कैसे राह निकालोगे..

    मंज़िल पाने की कोशिश को

    कितने कल पर टालोगे...

    नींद की चादर ओढ़ रखे थे

    जब उठने की बारी आई

    आज नहीं, कल में करते हैं

    तुमने यही कहानी गाई

    ऐसे करके बीता पल जो

    क्या वापस तुम पा लोगे

    मंज़िल पाने की कोशिश को

    कितने कल पर टालोगे...

    आज-आज, कल-कल होता है

    समझ नहीं हमको आया

    आलस के चंगुल में फंसकर

    हर अवसर हमने ढाया

    समय को कौड़ी भर माना तो

    जीवन कितना मानोगे...

    मंज़िल पाने की कोशिश को

    कितने कल पर टालोगे...

    जाता हर पल, छीन रहा है

    जीवन के सुंदर मोती

    हाथ मलोगे सोच सोचकर

    था मौक़ा, ली डुबकी होती

    समय छीन लेगा जब मोती

    मोती खड़े निहारोगे...

    मंज़िल पाने की कोशिश को

    कितने कल पर टालोगे...

    स्रोत :
    • रचनाकार : संदीप द्विवेदी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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