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काका, तुमते का कही फेरि,

यह चाक किहानी आजु केरि?

हयि बड़ा अजूबा, बड़यि मजा,

सुनतयि रहि जइहउ हेरि-फेरि।

मरघटियन ऊपर भरी भीर,

छा-सात जनाउर आये हयिं।

हयिं हाँथ-ग्वाड़ अउ मूड़उ हयिं।

टप्पा आँखिन पर छाए हयिं।

काकनि हम कँधई ते पूँछ्यन

उनकी पूँछइ को काटि लिहिसि?

अंगरेजु आयि सरकार जउन।”

कहि कयि हमका रपटाइ दिहिसि

काका, का अइस्यन बात आयि?

यह जाति फिरङ्गी मनइन की!

महिरावन की बिटिया अउ

बाँदर ते भयि पइदायिसि इनकी?

काका, दुइ-तीनि लढ़ी—अयिसी

मुलु उनमा पहिया चारि-चारि,

का मोटूकाटयि यिहे आयि?

छुवतयि तुरतयि भर्रायि उठीं।

ठाकुर जब प्वात असूल करयिं,

बंदूकु-दुनारी धरी रहयि;

मुलु सह्यबन तीर तीनि वइसी,

दुइ हाहाहूती देखि परयिं।

वह याक म्यहरिया जानि परयि

का, मर्दु-अयिसि, ढहनारु अयिसि!

कंजी-कंजी, हाँ, गोरि-गोरि,

का जानी काका कयिसि-कयिसि!

वह मूड़ु, फ्यकारे घूमति हयि

सब अंगु उघारे झूमति हयि;

वह कूद-कुदक्का ख्यालति हयि!

व्हढ़नी गलजिंदा डारे हयि।

हयि याक छोलदारी संघयि,

टिल्लन पर तउने तानि दिहिनि;

दुइ कुत्ता बड़के बाघु आयिस

द्यखतयि द्याखति रपटाय लिहिन।

काका, उइ ल्वखरिउ खायि लिहिन!

भूँजिनि टिकठी के बाँसन ते!

अधमरी रहयि अधजरी किहिनि,

झर्सी झारी कुस-कॉसन ते।

बखतयि बक च्वाँचयि मारि-मारि

पर झारि-झारि पटनारु' किहिनि;

चंदी चाचा के चाफँद मा

दस-बीस मुरयिला मारि लिहिनि।

काका, जब आयिं निसाचर यी

तब इनकी सींगयि कहाँ गयीं?

तुम कहति रहउ महिखासुर के

कुरँबा का अयिस रूप आयी।

पँच-पेड़वन तीर तलइय्यन मा

मछरी पकरायिनि दुई झउआ।

भूँजिनि, खायिनि, बाँटिनि चूँटिनि

कुछु पायि गवा छोटका नउआ।

छोटकवा लरिकवा साथ रहयि,

उहु आपु-आपु घिघियायि लाग;

कबरा कुतवा कुत्तन का देखिसि,

पोयिं-पोयिं पिपिहायि लाग।

उइ ठीक दुपहरी मा लउटे

तंबू भीतर तनियायि दिहिनि;

काकनि, उयि खायिनि सात दाउँ,

फिरि खायि लिहिन, फिरि खायि लिहिनि।

सँझवतिया आयी बड़ी झील मा

डलयी की डोंगिया डारिनि;

पयिरिनि-पयिरायिन, नाउ-न्यवारा

खेलि-खेलि का किलकारिनि।

सिट्टी-पपिहरा बजायिन मानुउँ

रोयि-रोयि का कुछु गायिनि।

कस याक-याक का पकरि-पकरि;

म्यहरिन्दो उचकि-उचकि नाचीं!

भरि-भरि स्वनहुले गिलासन मा

बोतल का पानी खोलि-खोलि।

दयि दिहिनि तपउना जानि परयि,

गिटि-पिटि-गिटि-पिटि कुछु बोलि-बोलि।

भोगई की भूड़न पर आये,

तब याक अयिसि बटिया पारिनि;

कँधई सरऊ के मुँहिं मा, बोतल

का पानी, उँडिलाय दिहिनि।

काका, कँधई तौ कँधई हयिं,

उयि किरिहटान कयिसे ह्वयि हयिं?

उनके लरिका, बिटिया, महतारी,

कयिसे धरमु छाँड़ि द्याहयिं?

जब लागि ज्वँधैया अथवयि, हन्नी,

पँच-भिट्ठन ऊपर आयीं;

मोटरयि किहिनि कुछु घर्र-घर्र

अयिसी आयीं, वयिसी आयीं।

सीसा की हँड़िया-अयिसी कुछु

उयि आपुयि रूपु बरयि लागीं;

मोटर अस जानि परयि भाजी;

अब हे भाजीं, अब हे भाजीं।

जो जयिस रहयि, तिहिका तयिसयि

फिरि साह्यब बकसीसयि बाँटिनि।

थयिला मा रुपया रहयिं चवन्ना

लोट लम्बरी ते छाँटिनि।

जब चलयि लागि साह्यब तब

हम हूँ झाँक्यन-झुँक्यन, सलाम किह्यन;

फिरि चारि चवन्ना चाँदी के

चच्चू जी, अँयठि इनाम लिह्यन।

सब द्याखयि कीन तमासा

उयि कउँधा ह्वयिगे, बिजुली ह्वयिगे;

बसि, पलक मारतयि मा मोटर

का जानी का किरला कयिगे।

काका, अँगरेज पताल-लोक ते

आये कहती दीदिनि हयिं;

उयि करयि बड़ी किम्मागोई ,

तिहि ते युहु देसु खरीदिनि हयि।

तबहे उनकी बंकन मा हयिं

रुपयन के गरगज गाँजि रहे।

तब तउ उनके बँगलन पर हैं

अँगरेजी बाजन बाजि रहे!

काका, अँगरेजन के दुनउ

ब्यरिया तरकारी बनती हयिं;

अउ पहितिउ परयि छउँक लागयि,

सक्करउ होयि तब उयि ज्याँवयिं?

ठाकुर साह्यब ते नीक खायिं,

का उयि ठाकुर के ठाकुर हयिं?

मुस्क्यान करयिं, किलक्यान करयिं

मन्नान करयि,भन्नान करयि?

काका, काँसन के पुरवा मा

सब भूँखन ते चिल्लान करयिं!

मुरझान करयिं बिरझान करयिं

बिल्लान करयिं, अकुतान करयिं।

काकनि, जब रामु घरयि जायउ,

अतनी फिरियादि जरूर किह्यउ—

जो जलमु दिह्यउ हमका स्वामी

अँगरेजयि के बच्चा कीन्ह्यउ।”

अँगरेज ह्वयि पायउ काका,

तउ जिमींदार के घर आयउ;

वहि मा कुछु मीन-मेखु बूकयिं,

तउ तुम पटवारी ह्वयि जायऊ।

पटवारी गीरी जो देयिं,

तउ चउकीदारी छीनि लिह्यउ;

बसि जलमु-जलमु आनन्दु किह्यउ,

सुख ते सोयउ, हँसि कयि जाग्यउ!

दुइ पहर दिनउना चढ़ि आवा

जायिति हयि रामु का कामु करयि;

बड़कये ख्यात ते का जानी

क्यतने कँगलन का पेटु भरयि।

स्रोत :
  • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 111)
  • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
  • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
  • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
  • संस्करण : 1998

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