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खोए हुए

khoe hue

अमित उपमन्यु

अमित उपमन्यु

खोए हुए

अमित उपमन्यु

और अधिकअमित उपमन्यु

    हाथ से डोर छूटते ही

    ग़ुब्बारे चल देते हैं अपनी यात्रा पर

    अनंत की ओर

    मैं देखता रहता हूँ उनको बढ़ता हुआ

    मेरी विस्मृति की ओर...

    कुछ शब्द समंदर में बहाई गआ बोतलबंद पहचानों की तरह

    धीरे-धीरे ज़बानों से दूर चले जाते हैं

    आख़िरी बचे कुछ सौ लोगों के साथ

    एक भाषा चुपचाप बैठी घूरती रहती है

    अपनी कुछ सौ क़दम दूर खड़ी मौत को

    टी.बी. की डूबती खाँसी,

    कैंसर के बुझते चेहरे भी

    किसी क्रॉस-वर्ड पहेली की तरह—

    बस एक तारीख़ की ओर इशारा करते हैं

    पर कुछ लोग बस यूँ हीं कहीं चले जाते हैं एक़दम से

    और फिर खंज़र की तरह कलेजे में बार-बार उतरते हैं

    उनकी नेम-प्लेट के नुकीले कोने,

    उनके फोन-नंबर के सारे विषम अंक

    और हर फ़ोटो में उनकी खिलखिलाती आँखें

    जो बच्चे निकले थे सुबह स्कूल या खेल के मैदान के लिए

    अगर वे लौटते नहीं गोधूली तक भी

    उसके बाद भी नहीं

    कभी भी नहीं

    तो उन घरों में क्षितिज पर ही टंगा रहता है सूरज

    हमेशा के लिए

    एक सवालिया निशान की तरह

    टूटते सितारों से भरी आकाशगंगा के

    एक ध्रुव तारे को सहेजे रहती हैं दो पनीली आँखे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अमित उपमन्यु
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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