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खाँटी घरेलू औरत-47

khanti gharelu aurat 47

ममता कालिया

ममता कालिया

खाँटी घरेलू औरत-47

ममता कालिया

और अधिकममता कालिया

    माँ पुराने तख़्त पर

    यों बैठती हैं

    जैसे वह हो सिंहासन बत्तीसी।

    हम सब

    उनके सामने

    नीची चौकियों पर टिक जातेहैं

    या खड़े रहते हैं अक्सर।

    माँ का कमरा

    उनका साम्राज्य है

    उन्हें पता है

    यहाँ कहाँ सौंफ़ की डिबिया है,

    कहाँ चूरन की शीशी।

    कमरे में कोई चौकीदार नहीं है।

    पर यहाँ कुछ भी

    बग़ैर इजाज़त छूना मना है।

    माँ जब ख़ुश होती हैं

    मर्तबान से निकाल कर

    थोड़े से मखाने दे देती हैं मुट्ठी में

    हम उनके कमरे में जाते हैं

    स्लीपर उतार।

    उनकी निश्छल हँसी में

    तमाम दिन की गर्द धूल छँट जाती है।

    एक समाचार

    हम उन्हें सुनाते हैं अख़बार से

    एक समाचार वह हमें सुनाती हैं

    अपने मुँहज़ुबानी अख़बार से

    उनके अख़बार में है

    हमारा परिवार, पड़ोस, मुहल्ला और

    मुहाने की सड़क।

    अक्सर उनके समाचार

    हमारी ख़बरों से ज़्यादा सार्थक होते हैं

    उनकी सूचनाएँ ज़्यादा सही और खरी।

    वह हर बात का

    एक मुकम्मल हल ढ़ूँढ़ना चाहती हैं

    बहुत जल्द उन्हें हमारी ख़बरें

    बासी और बेसिर-पैर की लगती हैं।

    वह हैरान हैं कि इतना पढ़-लिखकर भी

    हम किस क़दर मूर्ख हैं

    कि दुनिया बदलने का दम भरते हैं

    जबकि पहले तकियों के ग़िलाफ़ बदलने चाहिए।

    स्रोत :
    • पुस्तक : खाँटी घरेलू औरत (पृष्ठ 75)
    • रचनाकार : ममता कालिया
    • प्रकाशन : वाणी प्रकाशन
    • संस्करण : 2009

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