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कयिसि चकल्लस आई!

kayisi chakallas ai!

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

और अधिकबलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

    अब च्यातउ कढ़िले काका, बिथरे कर पुरला झारउ।

    जंगल की डूँडी-डँगरी, बाड़ी तक पूँछ उठायिनि!

    अँउँधानी आँखी ख्वालउ,

    अब बड़ी चकल्लस आई।

    द्याखउ तउ तनुकु उकसि कयि, दुनिया कस पल्टा खायिस,

    उयि लाटि कमहटर बच्चा, खरगू ते खीस निप्वारयिं!

    जब हमका बेदु पढ़ावहिं,

    तब बड़ी चकल्लस आई।

    बड़कये काँग्रेस वाले, पहिंदे गज्जी के ज्वाड़ा,

    तुम अपना का पहिंचान्यउ, तबहे तुमका पहिचानिनि,

    यहि पर कुछु स्वाचउ समुझउ,

    तउ बड़ी चकल्लस आई।

    द्याखउ तउ को-को आवयि, यी खगई के ख्यातन मा

    चकिया म्यल्वारि होई? जो देयि किसनऊ झाँसा।

    तुम चितवउ चारिउ कयिती,

    तउ वड़ी चकल्लस आई।

    सब अपने-अपने मन मा, हयिं बइठ बसंतु बनाए,

    स्यावा का सोंगु सजाये, पउढ़े घर पर तनियाए।

    तुम सबकी कलई ख्वालउ!

    हो, बड़ी चकल्लस आई।

    तुमरे टुकरन के ऊपर, सब व्यार मचा लतिहाउजु ,

    मुलु कोई कबहूँ जानिसि, यह किहिकी कयिसि तपस्या?

    सब हयिं पढ़ीस के बच्चा,

    बस बड़ी चकल्लस आई!

    स्रोत :
    • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 139)
    • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
    • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
    • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
    • संस्करण : 1998

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