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कविता ढूँढ़ती है उजास

kavita DhunDhati hai ujaas

अनुवाद : रीनू तलवाड़

आदम ज़गायेव्स्की

आदम ज़गायेव्स्की

कविता ढूँढ़ती है उजास

आदम ज़गायेव्स्की

और अधिकआदम ज़गायेव्स्की

    कविता उजास ढूँढ़ती है,

    कविता राजमार्ग है

    जो हमें सबसे दूर तक ले जाती है।

    निराशा के क्षणों में हम उजाला ढूँढ़ते हैं,

    दुपहर में, भोर के धुआँरे में,

    यहाँ तक कि बस में, किसी नवंबर में,

    जब एक बूढ़ा साधु बग़ल में ऊँघ रहा होता है।

    चीनी रेस्तराँ का वेटर अचानक सुबकने लगता है

    और कोई जान नहीं पाता ऐसा क्यों।

    क्या पता यह भी कोई तलाश हो,

    जैसे कि समुद्र तट पर वह पल,

    जब क्षितिज पर दीख पड़ा था लुटेरों का जहाज़

    और रुका रहा था, बहुत देर स्थिर।

    और गहन आनंद के पल

    एवं असंख्य पल व्यग्रता के भी।

    मुझे देखने दो, मैं पूछता हूँ।

    मुझे लगे रहने दो, मैं कहता हूँ।

    रात में एक ठंडी बारिश झरती है।

    मेरे शहर की सड़कों और गलियों में

    अंधकार चुपचाप कड़ी मेहनत करता है।

    कविता ढूँढ़ती है उजास।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : आदम ज़गायेव्स्की

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