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कविकोकिल

kavikokil

काञ्चीनाथ झा 'किरण'

और अधिककाञ्चीनाथ झा 'किरण'

    मिथिलाकेर आङनमे जे कवि कोइली बनिकय कयलक गान।

    मनुख-भावना, माटिक सौरभसँ भरलक धरती असमान॥

    बीतल छौ सय वर्ष तइओ, जकर गीत हो क्षीण पुरान।

    बर दिनोदिन जकर मधुरता-बल दो गुन होइत अछि भान॥

    जकर अनुप संगीतक लहरी, लाँधि कौशिकी गंडक गंग।

    कयलक प्लावित अंग मगध असम भोजपुर बंग कलिंग॥

    जकर नाम कीर्तनसँ मैथिल शत-सहस्र टुकरी भय माङल।

    भय रहलै अछि एक, मनोहर सोदर स्नेहेँ सानल-पागल॥

    कुटनी, पिसनी, पनिभरिनी महिसबार, गइबार किसान।

    रागी, यती, बटोही, गिरहथ रंक, धनी, मूरूख, मतिमान॥

    बाला, तरुणी, बूढ़ि, किशोरी, बालक, समरथ, बूढ़, जुआन।

    जकर गीतमे अप्पन अप्पन पाबय हृदयक धड़कन-गान॥

    बाट, घाट, मन्दिर, गहबर, घर, बाध, बोन, पाँतर, खरिहान।

    कोहबर, सोइरी मसानमे सबतरि गुंजय एक समान॥

    देशक पिछड़ल-जनक नेहवस देवक वाणीकेँ ठोकराय।

    धरतीक बोलीमे लिखि अपनहुँ धरती पुतमे देल मिलाय॥

    नहि थिर जीवन नहि थिर जौवन नहि थिर सुन्दर संसार।

    गेले अवसर पलटि पाओब किरित अमर थिक केवल सार॥

    मधुर गीतमे गाबि गाबि जे मायक बोलीमे लिख देल।

    सुमरि चरन, तइजन कविकेर, कवि किरणक सिर अछि अवनत भेल।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 75)
    • संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
    • रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
    • प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
    • संस्करण : 1989

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