मिथिलाकेर आङनमे जे कवि कोइली बनिकय कयलक गान।
मनुख-भावना, माटिक सौरभसँ भरलक धरती असमान॥
बीतल छौ सय वर्ष न तइओ, जकर गीत हो क्षीण पुरान।
बर दिनोदिन जकर मधुरता-बल दो गुन होइत अछि भान॥
जकर अनुप संगीतक लहरी, लाँधि कौशिकी गंडक गंग।
कयलक प्लावित अंग मगध ओ असम भोजपुर बंग कलिंग॥
जकर नाम कीर्तनसँ मैथिल शत-सहस्र टुकरी भय माङल।
भय रहलै अछि एक, मनोहर सोदर स्नेहेँ सानल-पागल॥
कुटनी, पिसनी, पनिभरिनी ओ महिसबार, गइबार किसान।
रागी, यती, बटोही, गिरहथ रंक, धनी, मूरूख, मतिमान॥
बाला, तरुणी, बूढ़ि, किशोरी, बालक, समरथ, बूढ़, जुआन।
जकर गीतमे अप्पन अप्पन पाबय हृदयक धड़कन-गान॥
बाट, घाट, मन्दिर, गहबर, घर, बाध, बोन, पाँतर, खरिहान।
कोहबर, सोइरी ओ मसानमे सबतरि गुंजय एक समान॥
देशक पिछड़ल-जनक नेहवस देवक वाणीकेँ ठोकराय।
धरतीक बोलीमे लिखि अपनहुँ धरती पुतमे देल मिलाय॥
नहि थिर जीवन नहि थिर जौवन नहि थिर ई सुन्दर संसार।
गेले अवसर पलटि न पाओब किरित अमर थिक केवल सार॥
मधुर गीतमे गाबि गाबि जे मायक बोलीमे लिख देल।
सुमरि चरन, तइजन कविकेर, कवि किरणक सिर अछि अवनत भेल।
- पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 75)
- संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
- रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
- प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
- संस्करण : 1989
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