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कविक प्रति

kavik prati

काञ्चीनाथ झा 'किरण'

और अधिककाञ्चीनाथ झा 'किरण'

    (1)

    कवि हओ! जनु कवि नाम हँसाबह

    अरसिककेर थपड़िक लोभेँ नहि

    प्रतिभा अपन सठाबह

    (2)

    सभा सभ दिन लागल भेटतह

    सभकेँ गाबि सुना नहि सकबह

    सब दिन लोक मूर्ख नहि रहतह

    सेहो कने विचारह

    (3)

    विकृते रूप जकर आलम्बन

    चेष्टाविकृत होइछ उद्दीपन

    निन्दा छै व्यभिचारि भाव

    तै रसकेँ कात हँटाबह

    (4)

    कवि रहलै सबदिन पथ-दर्शक

    गायक नहि, नर्तक नहि, शिक्षक

    ताहि पवित्र प्रतिष्ठाकेँ जनु

    कवि तौँ आइ घटाबह

    (5)

    पोथीकेर आखरकेँ पढ़ि कय

    कानय, काँपय अथवा चौंकय

    फानि उठय बूढ़ो उछाहसँ

    कविता तेहन बनाबह

    (6)

    अध: पतन सबकेर भेल छै

    निन्दे सभकेँ नीक लगै छै

    ताहि प्रवृत्तिक पोषण कय जनु

    देश-समाज बुड़ाबह

    (7)

    आनक कानब-खसब देखि कय

    हृदय-हीन जे बिहुँसय हरखय

    तै मानव-दानव समाजकेँ

    कविता लीखि सुधारह

    कवि हओ! नहि कवि नाम हँसाबह

    स्रोत :
    • पुस्तक : कतेक दिनक बाद (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 3)
    • संपादक : डॉ कैलासनाथ झा, शिवशंकर श्रीनिवास
    • रचनाकार : काञ्चीनाथ झा 'किरण'
    • प्रकाशन : किरण मैथिली साहित्य शोध संस्थान (धर्मपुर, लोहना रोड, दरभंगा)
    • संस्करण : 1989

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