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कवि-दरसन

kavi darsan

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

कवि-दरसन

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    याक दिन ऋतु बसंत मा गयन

    चरावइ गाईं बन की बार,

    सरग ते बिरवा बातै करइँ

    बनावइँ नित्त नये सिंगार।

    लवंगै लह-लह-लह-लह लहकि

    एकु बढ़िया फाटकु रचि देइँ

    बीच मा उझकैं सुन्दर फूल

    भौंर-तितुली उड़ि-उड़ि रसु लेइँ।

    आँब मा लटकै बाँदा-बौरु,

    क्वयलिया कूकै डारै-डार,

    सुवा पुलकित मनहे मन कहैं

    कबौ हरिहैं छुधा हमार।

    पपैया पी-पी करि चुप रहैं,

    चिरैया चेउँ चेउँ चिचियाइँ,

    ममाखी बौरन-बौरन फिरैं,

    बिरिछ मन फूले नहीं समाइँ।

    करौंदा महकैं घपचन लागि,

    चमेली बेला फूलइँ खूब,

    विछौना अस धरती पर डारि

    लागि है हरियरि-हरियरि दूब।

    बढ्यन आगे यक नद्दी परी,

    उठैं ज्यहिमा लहरी अनगिन्त,

    बिहंगम उड़ि-उड़ पानी पियैं

    कोई आदि, कोई अंत।

    चरावति गाईं देखति छटा,

    निहारति बन-बिरवन के रूप,

    नदी के नेरे-नेरे चल्यन

    सहति सुरजन की धीमी-धूप।

    चल्यन जब आगे का कुछु दूरि,

    एकु तपसी अस हमका दीख,

    बैठ बन के रखवाला, ऐस

    देति पंछी-बिरवन का सीख।

    ढेरु कगदन का आगे लाग

    खुले कुछु, कुछु झ्वारा मा बंद,

    दबाये कुछु कुहुनिन के तरे

    बैठ गंभीर सुखद सानंद।

    हाथ मा पकरे है यक कलम

    धरी है दहिनी वार दबात

    लाग आँखिन मा चसमा उजल,

    बैठ यहु कौनु पुरुषु अज्ञात।

    मूड़ मा बैरागिन कस बार,

    दयाँह नंगी है पागल पूर,

    निहारइ ना, ब्वालइ ना कुछू

    जानै कौन घ्यान मा चूर।

    कलम कबहूँ कागद पर चलैं,

    कबौं कुछु मन मा करै विचार,

    कबौं पुलकित ह्वै मन मुसुकाइ

    कबौं भावन मा करै बिहार।

    कबौं कुहुनिन तर कागदु दाबि,

    लगावै ठूढ़ी सेने हाथु,

    कबौं बिरछन पर फ्याँकै नजरि,

    कबौं नद्दी-लहरिन पर माथु।

    कलम धरि कागद परिहाँ कबौं,

    निगाहैं ऐसी-वैसी डारि,

    हाथ की अँगुरी इत उत फेरि

    कलम लै लिखइ कल्पना मारि।

    चहूँदिसि खूबै हरियरि बिरिछ

    बड़ी सुखदायक सुन्दर भूमि,

    बिहग-बंदर-बघवा रिच्छ

    रहे चौगिरदा हँसि-हँसि धूमि।

    सबन के सुनि-सुनि मधुरे बोल

    लगै मनई मन मुसुकाय,

    फूलि मनहे मन गरगजु होइ

    कहै कुछु धीरे ते गुन्नाय।

    दाहिने बायें पीठी वार

    ठढ़ी बाँबी हरियाली लादि,

    सँपौनू जिन मा ते मुलुकाइँ,

    देवावइँ महादेउ की यादि।

    सियरऊ, भ्यड़हू छिनु छिनु दौरि

    दरस दै चुप्पे लुकि लुकि जाइँ,

    हन्न पाढ़ा मृग उछरति फिरैं,

    न्यौरऊ फिरि-फिरि द्याखति जाइँ।

    फिरै चेंटी-च्याँटन की फौज,

    धरैं अपनी चिंघाट पर पाँउ,

    सदा आपुस मा घुलि-मिलि रहैं,

    समौ पर करें प्रेमु दाँउ।

    फुदकि डारन पर उछरैं-फिरैं

    बिहग सब कुतरि-कुतरि फल खाइँ,

    कबुत्तर-पडुखा रहे सिहाइ,

    सूर्ज की लाली मा अठिलाइँ।

    नदी के भीतर फरा स्यवारु,

    बसै जल-जीवन का संसारु,

    ठौरहें बड़े, ठौरहें छोटि

    करि रहे सँग आहारु-बिहारु।

    मगर-घड़ियाल-नाक-सुसुवार

    मूड़ बहि-बहि के रहे निसारि,

    निरन्तर पानी बहतै जाइ

    देखि भौ-बाधा भगै चिंघारि।

    देखिके अदभुत-अनुपम छटा

    चित्तु छिन भरि मा जाइ बिकाइ,

    मनौं भगवान सरग ते अलग

    दिहिनि यहु द्वासरु सरगु बसाइ।

    असै मनहे मन सोचति फिर्यन

    फेरि वापिस अपने सुख-धाम

    यादि रहि-रहि आवै वहु रूपु,

    भुलये भूलै आठौ जाम।

    बतायन सब संघिन का सही

    हुँवा की प्रकृति, हुँवा का ठाउँ,

    औरु वहि मनई का बिरतंतु

    जपि रहा जानै क्यहिका नाउँ।

    अकेले दुनिया ते लड़ि रहा,

    धरे दुनिया का समुहें भूतु

    बताइनि पंडित है क्वै कबी

    बनी बैठा जोगी अवधूत।

    26 जुलाई 1951

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 19)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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