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कारागुआता2 की कविताएँ
अंतिम समय आने तक
हर इंसान के पास होगी एक छोटी-सी प्रकृति छवि,
ढँक सके जिससे उस उपच्छाया को
जो हर रोगी के कमरे में पड़ती है!
मानों, नदी का यह टुकड़ा भी ठीक है
यही छवि बस जाएगी यादों में : हरे सब तट
चारों ओर, उज्ज्वल, प्रशांत।
इस दृश्य में दो गतियाँ हैं :
इधर से चले वो नाँव
निःशब्द, उधर की ओर,
दृश्यपट सारा पलट के आए
उधर से इधर की ओर, शांत,
ख़यालों को जाग्रत करता।
एक गहरा-सा लंगर डालता है यह पट।
और जब आख़िरी बार सब लंगर उठा
चलने का होगा समय
तो इस नाविक के मन में न होंगी दीवारें
—बोतल, बिस्तर, दवाई—
होगी तो यही स्थिर नदी
सूर्य की किरणों में दमकती।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 219)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
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