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काल नदी से उपजी हुई

kal nadi se upji hui

शिवमंगल सिद्धांतकर

शिवमंगल सिद्धांतकर

काल नदी से उपजी हुई

शिवमंगल सिद्धांतकर

और अधिकशिवमंगल सिद्धांतकर

    काल नदी से उपजी हुई

    क़लम कट गई है

    जाने किस-किससे कट गया हूँ बौनों

    के बीच बीच बैठ बैठ कर बेहद परेशान हूँ

    अंतरिक्ष को आग़ोश में क़ैद करना

    चाहता हूँ

    कीचड़ में फँसा हुआ पाता हूँ

    कहना चाहता हूँ पंख भारी हो गए हैं

    उत्पीड़ितों के आँसू इस तरह बरस रहे हैं

    शब्द शर्म से झुक गए हैं

    पहली बार अपने आपको इतना छोटा

    महसूस कर रहा हूँ

    बौनों की तरह झूठमूठ का उत्साह दिखला

    नहीं सकता हूँ

    स्रोत :
    • पुस्तक : काल नदी (पृष्ठ 1)
    • रचनाकार : शिवमंगल सिद्धांतकर
    • प्रकाशन : राग विराग प्रकाशन
    • संस्करण : 2003

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