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कहो, भला कैसे योद्धा हो...

kaho, bhala kaise yoddha ho. . .

संदीप द्विवेदी

संदीप द्विवेदी

कहो, भला कैसे योद्धा हो...

संदीप द्विवेदी

और अधिकसंदीप द्विवेदी

    युद्धभूमि पर मात देखकर

    माथ को अपने हाथ टेककर

    बैठ गए तुम इतना जल्दी

    कहो, भला कैसे योद्धा हो

    तुम्हीं बताओ हार गए जो

    क्या तुम ऐसे एकलौते हो?

    क्या दुख जीत गँवा देने का

    बोलो बस तुम ही सहते हो

    संग्रामी तो किसी हार पर

    कभी बैठे हार मानकर

    वीर सभा में कोई नहीं जो

    इस तरह हार पर रोता हो

    कहो भला कैसे योद्धा हो...

    भिड़ना है जब तूफ़ानों से

    क्यों घबराएँ ढह जाने से

    ठाना है यदि पाना है कुछ?

    क्या डरना कुछ खो जाने से

    पंख उठे यदि तूफ़ानों पर

    घाव तो लगने हैं बाहों पर

    ऊँचे लक्ष्य बिना पीड़ा के

    कहो कहीं जो होता हो

    कहो भला कैसे योद्धा हो।

    हाँ, सच है घबराता है मन

    घेरा करती है जब उलझन...

    पर उलझन सुलझाने को ही

    योद्धाओं का होता जीवन...

    लक्ष्य को पाँव उठे जो तेरे

    फिर क्यों हो ये मन में घेरे

    कौन है वो, यह कोलाहल

    मन में जिसके ना होता हो

    कहो भला कैसे योद्धा हो..

    शैलों को देखा हैं अक्सर

    मेघ सदा रखते हैं ढककर

    शिखर सदा लड़ते आए हैं

    अवरोधों से निर्भय डटकर

    हिमसागर बरसे तो बरसे

    शिखर नहीं हटते हैं डर से

    यही अडिगता होगी रखनी

    तुम यदि कोई प्रणेता हो...

    कहो, भला कैसे योद्धा हो...

    स्रोत :
    • रचनाकार : संदीप द्विवेदी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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