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कहाँ है वह आँखें!

kahan hai wo ankhen!

सुमन शेखर

सुमन शेखर

कहाँ है वह आँखें!

सुमन शेखर

और अधिकसुमन शेखर

    (उदय प्रकाश को पढ़ते हुए)

    ऑफ़िस में काम करती हुई लड़की

    आठ घँटे की शिफ़्ट में आठ सौ बार नंगी होती है

    अपने ही साथियों के सामने

    उसके केबिन से बाहर के दरवाज़े तक

    लंबी-लंबी रस्सी तनी है आँखो की

    एक लड़की

    जो सड़क पर गुड्डे बेचती है

    अभी अभी उसका हुआ है बलात्कार एक महँगी कार वालों के हाथ

    एक बच्ची

    जो घर में खेल रही है छुप्पन-छुपाई का खेल

    स्कूल से जल्दी लौट आने पर

    उसे उसके रिश्तेदार ने छुआ है अभी-अभी गली के मुहाने पर

    एक बुढ़िया

    जो शाम से बैठी थी मस्जिद के सामने हाथ फैलाए रोज़ की तरह

    उसकी हथेली पर गिरा है सफ़ेद गाढ़ा द्रव

    कुछ लड़के अभी-अभी अपनी पेंट की चैन चढ़ाकर निकले हैं

    एक औरत

    जिसके साथ सुबह से शाम तक हुआ है बलात्कार

    कई-कई बार आँखों और हथेलियों से

    वह अब भी चलने को लाचार है

    आँखें फेरते हुए भेड़ियों से भरे

    इस बीहड़ जंगल में

    एक लड़की

    जिसने बहुत यक़ीन के साथ

    रात को अपने दोस्तों के साथ पहली बार शराब की एक घूँट ली

    बंद कमरे में

    सुबह उसकी देह दर्द से भरी और गीली पाई गई, और दोस्त ग़ायब

    एक मॉडल

    जो बीते कई दिनों-सालों से जूझ रही है ख़ुद को बचा पाने

    और कहीं ठीक-ठाक सी फ़िल्म में दिखे जाने के लिए

    ऑफ़िस और कैफ़े में हर मीटिंग में सामने वाले की नज़र

    मॉडल की जाँघ और सीने को कुतरती जाती हैं

    शादी कर बिस्तर पर अभी-अभी गिरी लड़की

    जिसने अब तक बचाए रखा था अपनी अस्मिता और

    कुंवारेपन से देखे थे अपनी पहली रात के हसीन सपने

    कुँडी चढ़ाकर पल भर में ध्वस्त हो गई अपने मर्द के हाथों

    नहीं पूछ सकती है कोई भी सवाल

    नहीं उठा सकती है उँगली कहीं और सिवाय ख़ुद के

    यही तो देखा है बचपन से

    सदियों से सेंक-पका रही है अपनी देह को निवाले के लिए

    नहीं है कोई वजूद उसके दुख का कहीं

    सन्नाटे में बड़बड़ाती हुई लड़कियाँ किसी भी उम्र में

    दुनिया के किस कोने में है सुरक्षित!

    कहाँ है वह हाथ जो बचा सके लुट जाने से!

    कहाँ है वह आँखें,

    जिसे देख बच जाए संतोष और सुरक्षा की उम्मीद!

    क्या कोई भी लड़की बच पाई है शेष

    लिजलिजाती-बजबजाती नज़रों से

    छोटे-छोटे दैनिक बलात्कारों से!

    कहाँ रह गई है कमी!

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुमन शेखर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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