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काल-प्रवाह

kaal pravah

पड़ल छथि बन्धन मे मृगराज!

भरल नयन, नहि चएन हृदय मे,

छिन्न-भिन्न सब साज!

दुर्गति परम प्रगतिमय, पसरल,

अछि भारी भ्रम-जाल;

बक हँसैत अछि कुटिल हँसी,

कलपै छथि क्षुब्ध मराल;

जे कँपैत छल डर सँ थर-थर,

आब तकरो लाज।

पड़ल छथि बन्धन मे मृगराज!

उर-सागर गम्भीर, शान्त,

दबकल अछि प्रलय-तरङ्ग;

नियति नचै अछि नग्न नृत्य,

अछि काल बनल बदरङ्ग;

मरत ककर क्रोधानल मे जरि,

वैह शक्ति-साहस अछि

भेटब तइओ दुर्लभ ग्रास;

सुधा-दान जे कए सकैत छथि,

मिटए तन के प्यास;

डूबत हाए! कियै नहि, बूड़ल

जखन विवेक-जहाज?

पड़ल छथि बन्धन मे मृगराज!

भेनहि की हो स्पन्दन;

तन-मन पराभूत, निष्प्राण;

छटपटाइ अछि आइ कण्ठगत

भए ज्वालामय गान;

लै'छ लेखनी रुद्ध-श्वास,

जागत की तखन समाज

पड़ल छथि बन्धन मे मृगराज!

स्रोत :
  • पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 62)
  • संपादक : अजीत मिश्र
  • रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2024

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