रचना

और अधिकशैलजा पाठक

    रचना भीतरी महाल की लड़की थी

    बड़ी मुश्किल से स्कूल आती

    बस्ते में किताबें नहीं

    घरवाले भरे होते

    पेन की निब पर उनकी आँखें उसे तरेरतीं

    रचना हमेशा डरती रही

    रचना की सेकेंड हैंड किताब में

    पहले के विद्यार्थी ने दिल उकेरा था

    आँखें उकेरी थीं

    लिखी थी पिछले पन्ने पर कोई दिलकश शाइरी

    रचना सेकेंड हैंड किताब के उस आशिक़ से प्यार करने लगी

    उसने भी बना दीं आँखें सजल

    एक दिल पास-पास

    कुछ लाइनें लिखीं और किताब को छाती से लगा लिया

    रचना का दिल धड़का

    बस्ते के लोग एकदम ग़ायब हो गए

    निब पर आँखें नहीं

    दो खुले होंठ थे

    वे कुछ कहते रहते

    रचना को प्रेम करने की सज़ा मिली

    बस्ते के लोगों ने बाहर निकल

    उसकी आँखों और दिल वाली किताब के पन्ने उड़ा दिए

    लिखी लाइन पे उठाए सवालों के जवाब में

    वह ज़मीन में गड़ गई थी

    इस तरह रचना भी वही आम लड़की निकली—

    डरी-सहमी

    प्यार के एहसास की अपराधी बनी

    और एक दिन

    एक अदद घर में

    लाल कपड़ों में चुनवा दी गई

    निब की टूटी नोक से

    अनगिनत रचनाओं के कोरे पन्ने

    फाड़े जा रहे करर-करर

    सेकेंड हैंड की उस किताब का पुराना पाठक

    दिल में छुपा बैठा है

    रचना समय के कटघरे में खड़ी है... मी लॉर्ड

    उसे अपनी सफ़ाई में कुछ नहीं कहना

    आप सजा सुनाएँ...

    स्रोत :
    • रचनाकार : शैलजा पाठक
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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