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वर्षा-उल्लास

varsha ullaas

आरसी प्रसाद सिंह

आरसी प्रसाद सिंह

वर्षा-उल्लास

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    वर्षा-ऋतु आयल पुनि नाचि उठल मन-मयूर।

    काजर-सन कारी रसवन्ती उड़ि गेल तूर।

    फेर हमर आँगनमे फुलि गेल नवकदम्ब।

    लतरि गेल चारू दिस श्यामलता निरवलम्ब।

    बिजुरी केर फूल खने हँसय, खने मुरझि जाय।

    कजरी-वन चरय धास लाख-लख नील गाय।

    धूरी पर झूमि रहल धरती केर धूर-धूर।

    वर्षा-ऋतु आयल पुनि, नाचि उठल मन-मयूर।

    परदेसी रोपि गेल छल जे कलमी रसाल।

    अपरुव फल ओहिमे बहार भेल बेमिसाल।

    आबामे ग्रीष्मक जे जरल मुइल छल किसान,

    चलल मगन खेत बाउग करै ले मकइ, धान।

    भावुक बनि प्राण राजहंस जकाँ उड़य दूर।

    वर्षा-ऋतु आयल पुनि, नाचि उठल मन-मयूर।

    थिरकि-थिरकि उठल पयर तालपर उमंग अंग।

    गरजि रहल सधन गगन-बीच उच्च धन-मृदंग।

    पावस-महीप केर बाजि गेल वज्र-शंख।

    वियज-केतु फहरि उठल जनु असंख्य मोर-पंख।

    बून-बान-झड़ी लगा देल सजल जलद-शूर।

    वर्षा-ऋतु आयल पुनि, नाचि उठल मन-मयूर।

    आइ हमर प्रेरणाक स्रोत चलल मुक्त छन्द।

    रहल जे विराग-व्यथा-तापमे विदग्ध बन्द।

    जानि ने निहारि कोन रूपसी घटा-मुखी।

    हर्षसँ विभोर रक्त, रोम-रोम हमर सुखी।

    चेतनाक दीप जरय लागि गेल बनि कपूर।

    वर्षा-ऋतु आयल पुनि, नाचि उठल मन-मयूर।

    खोलि देल पूरबी समीर गीत-प्रीत-द्वार।

    कंठ-कंठमे तरंग, तान, राग, सुर, मलार।

    पाहुन घन आबि गेल छोड़ि सिन्धु-गृह-प्रवास।

    अंतरिक्ष-आननपर इन्द्रधनुष-सौम्य हास।

    मानिनी धराक पानि पानि भऽ चलल गरूर।

    वर्षा-ऋतु आयल पुनि, नाचि उठल मन-मयूर।

    कल्पनाक आँजुरि-भरि फूलक लऽ अर्ध-सार

    विजन बाटमे बँटैत मातल-छवि कवि-कुमार।

    निर्झरिणी, नदी चलल उढ़रि नवल वयस घोर।

    अचलोकेँ चंचल कऽ देल घन-निनाद घोर।

    कज्जल गिरिपर उपजल तरुवर कि कृष्णचूड़?

    वर्षा-ऋतु आयल पुनि, नाचि उठल मन-मयूर।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 15)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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