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झँडा बेचने वाला लड़का

jhanDa bechne vala laDka

रिदम राही

रिदम राही

झँडा बेचने वाला लड़का

रिदम राही

और अधिकरिदम राही

    वह नंगे पाँव था

    आज़ाद भारत में

    रोज़गार के थपेड़ों का झँडा बेचता।

    उधर कार वाले ने बड़ी अकड़ से पूछा—

    लड़के, झँडा कितने का है?

    वह मासूमियत से बोला,

    पाँच का एक, साहब।

    कार वाले ने दो झँडे ख़रीद लिए

    वह झँडा बेचने वाला लड़का

    तिरस्कृत होने के बाद भी

    दस की नोट से राहत पा गया।

    वह इसी तरह बेचता रहा

    एक स्कूल के बाहर खड़ा होकर

    ज़िम्मेदारियों के बालपन की

    अपनी फटी क़िस्मत

    अरमानों के फटे हुए झोले में

    कुछ तीन रंग के बिल्ले

    केसरिया, सफ़ेद, हरे काग़ज़ वाले

    जिसमें गहरे नीले रंग का अशोक चक्र था।

    स्कूल आने-जाने वाले बच्चे ख़रीदते रहे

    उन बिल्लों को पहनकर देश प्रेम में रंगते रहे

    उन बच्चों के माता-पिता भी

    वह थोड़ी रोज़गारी पाकर ख़ुश होता रहा।

    ख़ुश होता रहा कि कमाई हो गई

    चलो अच्छा है

    आज बीमार माँ की दवाई हो गई।

    इस तरह जीवन की दिहाड़ी पाकर

    स्कूल के बाहर उसने भी सुना

    भारत का 'जन गण मन',

    और तो और,

    औरों की नकल करता

    खड़ा रहा सावधान की मुद्रा में।

    भले ही वह 'जन गण मन' का मतलब

    समझने में नाकाम रहा

    फिर भी नंगे पाँव, हाल्फ़ निक्कर,

    मटमैली पीली शर्ट पहने,

    बड़े गर्व से तिरंगे को सैल्यूट करता रहा

    उसने भी बोला उस दिन,

    सीना तानकर,

    भारत माता की जय,

    और मनाया अपने हिस्से का

    ‘आज़ादी का जश्न’।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रिदम राही
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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